2017 से चलते-चलते


सम्पादकीय – नित्यानंद गायेन
देखते-देखते एक और साल निकल गया । कैलेंडर को पलट कर देखें तो घटनाओं की भरमार हैं । किन्तु उनमें से कितनी घटनाएं सुखद रहीं यह महत्वपूर्ण बात है। भारत में हर साल 12,000 किसान आत्महत्या करते हैं । राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2015 में 12,602 किसानों और कृषि मजदूरों ने आत्महत्या की। किसानों की आत्महत्या में लगभग 42 प्रतिशत की चिंताजनक वृद्धि हुई है।
सरकार के अनुसार 2015 में कृषि क्षेत्र से जुड़े कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की। इनमें 8,007 किसान-उत्पादक थे जबकि 4,595 लोग कृषि संबंधी श्रमिक के तौर पर काम कर रहे थे। 2015 में भारत में कुल 1,33,623 आत्महत्याओं में से अपनी जान लेने वाले 9.4 प्रतिशत किसान थे। यह आंकड़ा 2015 का है, पर 2014 के मुकाबले 2015 में किसानों और खेती से जुड़े मजदूरों के आत्महत्या में 2 फीसदी बढ़ोतरी हुई थी।
तमाम दावे और जुमलों के बीच मोदी सरकार के राज में किसानों की आत्महत्या रुकने की बजाय और बढ़ गयी है। पांच साल में किसानों की आय दोगुनी करने के दावों के बीच किसानों की बदहाली की तस्वीर सामने सबके है।
भारत में किसानों की आत्महत्याएं कितना संगीन मामला बन चुकी हैं, यह सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट को दिए गए आंकड़ों से साफ होता है। खुद सरकार ने बताया है कि हर साल 12 हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। हमें डर है कि 2016 और 2017 के रिकार्ड में यह संख्या मौजूदा 12 हजार की संख्या को पार कर चुकी है। यह भय निराधार नहीं है । साल भर समाचार माध्यमों में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार एक आकलन के आधार पर है ।
मध्य प्रदेश में किसानों की छाती पर शासन की बंदूक चली, राजस्थान में किसानों को अपनी जमीन सरकार से बचाने के लिए भूमि खोद कर सत्याग्रह करने को मजबूर होना पड़ा। उत्तर प्रदेश में कर्ज माफी के नाम पर उनका मजाक उड़ाया गया। जन्तर मंतर पर किसानों का लम्बा अनशन चला अंत में सरकार ने जन्तर-मंतर ही खाली करा दिया। पुलिस ने लाठी मार कर सबको खदेड़ दिया। कठपुतली कॉलोनी उजाड़ दी गई। पीएम जी ने बार-बार याद दिलाया-हमें ’आपातकाल को भूलना नहीं चाहिए !’
श्रम ब्यूरो के एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2015-16 में देश की बेरोजगारी दर 5 फीसदी बढ़ गयी थी। यह पिछले 5 वर्षों में सबसे ऊँचा स्तर था। वर्ष 2016 और 2017 में भी बेरोजगारों की संख्या में भारी इजाफा हुआ है। पिछले वर्ष कालेधन के नाम पर आपात नोटबंदी घोषणा के कारण लाखों लोग बेरोजगार हो गये हैं। वहीं सरकार के मंत्री इस बात को अपने पक्ष में बता चुके हैं। उनके अनुसार युवा अब नौकरी करना नहीं चाहते बल्कि नौकरी देना चाहते हैं। पर सवाल है जब युवा नौकरी करना नहीं चाहते तो वे नौकरी देना किसे चाहते हैं ? संयुक्त राष्ट्र श्रम संगठन की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 और 2018 के बीच भारत में बेरोजगारी में मामूली इजाफा हो सकता है और रोजगार सृजन में बाधा आने के संकेत हैं।
उसी तरह कुपोषण और शिशु मृत्युदर में कितनी कमी आई है यह तो सरकार ही जाने ! पर हाँ इसी साल गोरखपुर मेडिकल कॉलेज सहित कई अन्य राज्यों में सैकड़ों बच्चों ने दम तोड़ दिया और जब मृत बच्चों के माँ-बाप दुःख से रो रहे थे तो योगी के स्वास्थ्य मंत्री बता रहे थे कि ‘बच्चे तो अगस्त में मरते रहते हैं’ और मौत का वो अगस्त बहुत लम्बा चला। झारखण्ड में 11 साल की मासूम संतोष कुमारी 8 महीने तक राशन न मिलने के कारण भात-भात चीखते हुए मर गई ।
भावुक प्रधान सेवक ने गरीबों को दरिद्र नारायण कहा और कांग्रेस से भावुक अपील की कि वह (कांग्रेस) उनकी गरीबी और गरीबों का मजाक न उड़ायें। अगले फिर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की बेटी इवांका ट्रंप के साथ हैदराबाद के फलकनुमा पैलेस में शाहीभोज में शामिल हुए। गौरतलब बात यह है कि इवांका के लिए हैदराबाद को भिखारी मुक्त बनाने के लिए भिखारियों को पकड़ कर जेल में भर दिया गया और सैकड़ो भिखारियों ने खुद ही हैदराबाद छोड़ दिया ।
अच्छे दिनों के जुमले के साथ ही प्रधान सेवक जी ने बेटी बचाओ का भी नारा दिया था । इस नारे के बारे में क्या कहूँ? परिणाम आपके सामने हैं और रोज आ रहे हैं। आसाराम, राम – रहीम और अब दिल्ली का कोई बाबा !
उनकी ही पार्टी के एक नेता का बेटा रात को एक महिला की कार का पीछा करता पकड़ा जाता है। यूपी के योगी जी एंटी रोमियो दल गठित करते हैं तो वहीं सरेआम महिला पुलिस अधिकारी पर हमला होता है। बलात्कार और हत्या की घटनाएँ तो लगभग रोज हो रही है।
एक और प्रसिद्ध जुमला था ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ माल्या खा के भाग गया, अम्बानी-अडानी जी कितना खा-पी रहे हैं इसका पता आप लगाते रहिए, हम नहीं बताएंगे। लड़ाकू विमान राफेल सौदे की बात करना सैनिकों का अपमान है खुद देश की प्रथम महिला रक्षा मंत्री जी बोल चुकी हैं।
हाँ, जिस 2 जी घोटाले को लेकर तत्कालीन विपक्ष और वर्तमान सत्ताधारी भाजपा ने महीनों तक संसद चलने नहीं दिया था अब उन्ही के शासनकाल में सभी आरोपित बरी हो गये। अब सवाल बनता है कि सीबीआई अभी किसके अधीन हैं ? खैर उन्ही की पार्टी के नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने खुद ही बता दिया है। मजेदार यह है कि इस फैसले के बाद वितमंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि यह फैसला कोई ईमानदारी का प्रमाण-पत्र नहीं है। उन्होंने सही ही कहा है । क्योंकि खुद उनको और उनके दल के जिन नेताओं को देश के विभिन्न अदालतों ने विभिन्न मामलों में बरी किया है वो सब भी इसी तरह ईमानदार नहीं है ! उम्मीद है कि वे इस बात से भी सहमत होंगे ।
‘सबका साथ, सबका विकास’ इस विश्व प्रसिद्ध नारे से यदि ‘साथ’ और ‘विकास’ निकाल दिया जाये तो केवल सबका-सबका बच जाता है और आ की मात्रा हटा लेने पर बचेगा-सबक !
मैंने इस नारे को विश्व प्रसिद्ध इसलिए कहा है क्यों कि 2014 लोकसभा चुनाव प्रचार के समय से लेकर 2016 तक देश की फिजाओं में यह गूंजता रहा। फिर पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी इसकी गूंज रही। कई विदेशी नेताओं ने इस नारे की प्रशंसा की, डोनाल्ड ट्रम्प ने भी की, शिंजे ने भी। पर विकास की खोज आज भी जारी है । पता नहीं किस मेले की भीड़ में खो गया है बेचारा ।
षायद विकास भी ‘अच्छे दिन’ आने की प्रतीक्षा में कहीं दुबक के बैठा हुआ हो। शायद वो लौट आये जब बनारस क्योटो बन जाएँ। जब महंगाई की मार खत्म हो जाये । शायद तब लौटे वो जब कोई सच्चा चैकीदार जनता की जान-माल की रक्षा के लिए आ जाये ।
यह साल जाते-जाते सरकार ने भी आखिर मान ही लिया है कि उसके शब्दकोश में ‘शहीद’ नामक कोई शब्द ही नहीं है !
बाकी और क्या-क्या लिखूं ? बस उम्मीद करता हूँ कि नये वर्ष में सब सुरक्षित रहें, किसी निर्भया को भय न लगें, कोई संतोष कुमारी भूख सेे दम न तोड़ें, किसी किसान को आत्महत्या करने पर मजबूर न होना पड़ें, किसी अखलाक, जुनैद या पहलू खान को अपने धर्म के कारण जान न देनी पड़े, बचाव पक्ष अपराधियों के साथ न खड़ा हो जायें, कलम चलाने पर किसी गौरी लंकेश की हत्या न हों। कहीं आग न लगे, कोई बस्ती न जले। देश के भीतर और सीमा पर अमन-शांति हों ।
बस इन्हीं कुछ उम्मीदों के साथ, आप सभी को शुभकामनाएं ।

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