स्टेट बैंक पर मंडराता खतरा


—- मुशर्रफ़ अली
यूँ तो भारत में सरकारी बैंक उद्योग पर संकट के बादल काफ़ी समय से मंडरा रहे हैं लेकिन सबसे बड़े खतरे में स्टेट बैंक आॅफ़ इन्डिया है। जिस तरह आप अपने व्यापार में किसी ग़लत आदमी से साझीदारी कर लेते हैं और बाद को वह आपके व्यापार पर कब्ज़ा करके बैठ जाता है वैसा ही स्टेट बैंक के साथ होने की संभावना नज़र आ रही है। कारण है रिलाईंस और स्टेट बैंक का पेमेंट बेंकिंग में संयुक्त उद्यम लगाने का समझौता। रिलाईंस ने पेमेंट बैंक खोलने के लिए लायसेंस हेतु रिज़र्व बैंक को आवेदन किया था जो स्वीकार हो गया है।
रिलाईंस इन्डस्ट्रीज़ लिमिटेड इसकी प्रोमोटर है और स्टेट बैंक आॅफ़ इन्डिया उसकी सहसाझीदार। पेमेंट बैंकिंग के इस व्यापार में एस.बी.आई. की हिस्सेदारी केवल 30 प्रतिशत रहेगी जबकि 70 प्रतिशत मुनाफ़े पर रिलाईंस का मालिकाना रहेगा। रिलाईंस इस तीस प्रतिशत हिस्से के एवज़ में एसबीआई के देश-विदेश में फ़ैले पूरे नेटवर्क और आधारभूत ढांचंे का इस्तेमाल करेगा। स्मरण रहे स्टेट बैंक आॅफ़ इन्डिया की देश के अन्दर 16081 शाखाएं हैं। इसके अलावा 35 देशों में 189 कार्यालय हैं। उसके पास साढ़े बाईस करोड़ सक्रिय ग्राहक हैं। 30 सितम्बर 2014 के अनुसार स्टेट बैंक के पास 14 लाख 73 हज़ार 785 करोड़ रुपए बैंक में जमा थे। 12 लाख 9 हज़ार 648 करोड़ रुपए कर्ज़ में बंटे हुए थे और 18 लाख 74 हज़ार 332 करोड़ रुपए की सम्पत्ति थी। स्टेट बैंक आॅफ़ इन्डिया ने अपने कारोबार को विस्तार देने के लिए 61501 बिजनिस कोरस्पोन्डेंस जोड़े हैं इसके अलावा उसने अगली पीढ़ी की बैंकिंग सेवा उपलब्ध कराने के लिए देशभर में 7 डिजिटल शाखाएं खोली हैं। रिलांइर्स को मुफ़्त में इतना बड़ा सरकारी बैंक का ढांचा और उसमें कार्यरत् कर्मचारी उपयोग के लिए मिल जाऐंगे। न उसे आॅफ़िस बनाने पर एक पैसा खर्च करना पड़ेगा और न ही उसे कर्मचारी भर्ती करने पड़ेंगे। कर्मचारियों को वेतन देने या उनकी अन्य ज़िम्मेदारी उठाने का तो सवाल ही नही पैदा होता।
जैसा कि रिलाईंस का इतिहास रहा है कि यह जो समझौता करता है उसपर क़ायम नही रहता। कृश्णा गोदावरी बेसिन का उदाहरण सबके सामने है। सन् 1991 में नरसिम्हाराव सरकार ने नई आर्थिक नीति की घोशणा करने के बाद निजी व विदेशी कम्पनियों को तेल और गैस खोजने तथा उसका उत्पादन करने की इजाजत दे दी। शुरु में छोटे व मध्यम दरजे के तेल व गैस ब्लाॅक आवंटित किए गए। 1999 को न्यू एक्सप्लोरेशन एण्ड लाईसेंसिंग पाॅलीसी (एन.ई.एल.पी.) के तहत बड़े ब्लाॅक के आवंटन की मंजूरी दी गई। रिलाईंस ने उस समय आंध्र प्रदेश स्थित कृश्णा गोदावरी बेसिन में डीडब्ल्यूएन/98-3 जिसका क्षेत्रफल 8100 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है उसमें डी6 ब्लाॅक में से गैस निकालने का ठेका हासिल किया। रिलाईंस ने अपने टेन्डर में कहा कि वह 240 करोड़ डालर उत्पादन लागत में प्रति दिन 40 मिलियन मीट्रिक स्टेन्डर्ड क्यूबिक मीटर (मिमीएससीएम) गैस निकालकर देगा। समझौते में यह भी तय था कि अगर इससे कम उत्पादन होगा तो ठेकेदार को हर्जाना देना होगा। बाद को रिलाईंस टेन्डर में दी गई लागत से पलट गया और उसने कहा कि मंहगाई बढ़ जाने से उसकी उत्पादन लागत ज़्यादा आ रही है इसलिए वह 850 करोड़ डालर में 80 मिमीएससीएम गैस प्रतिदिन निकालकर देगा। इसपर कैग और अन्य विशेशज्ञों ने इसपर एतराज़ ज़ाहिर किया। एतराज़ की जायज़ वजह थी क्यूंकि रिलाईंस ने अपनी मर्ज़ी से लागत का अपना टेन्डर दिया था और उसे अपनी बात पर क़ायम रहना चाहिए था। यहाँ एतराज़ की एक और बात थी कि रिलाईंस ने गैस का उत्पादन तो 40 से 80 मिमीएससीएम प्रतिदिन यानि दोगुना करने की बात की थी लेकिन लागत लगभग चारगुना यानि 240 करोड़ डालर से 850 करोड़ डालर कर दी। इसपर कैग ने उत्पादन लागत की जाँच करनी चाही लेकिन रिलाईंस ने अपने हिसाब के खाते ही उपलब्ध नही कराए। कैग ने कहा कि वह एकाँऊट के साथ ही परफ़ोरमेंस आॅडिट भी करेगा लेकिन रिलाईंस ने कहा कि वह परफ़ोरमेंस आॅडिट नही कराएगा केवल एकाँऊट आॅडिट ही कराएगा। रिलाईंस का एकाँऊट आॅडिट का मतलब है कि वह जो लागत का ब्यौरा देगा कैग केवल उसके जोड़-घटा और गुणा-भाग की जाँच करले। परफ़ोरमेंस आॅडिट का मतलब है कि कैग यह जाँच करेगा कि रिलाईंस ने जो लागत का विवरण दिया है उसका बाज़ार में मूल्य क्या है। अर्थात उसने लागत में जो सामान दिखाया है उसका मूल्य उस समय कितना है या जो श्रम घन्टे दिखाए हैं इनमें फ़र्ज़ी तो नही है। रिलाईंस इस तरह की जाँच कराने को तैयार नही था। सरकार का रिलाईंस से गैस निकालने का जो समझौता हुआ था उसमें यह शामिल था कि रिलाईंस जब गैस का उत्पादन शुरु करेगा तब वह गैस बेचकर पहले अपनी उत्पादन लागत को निकाल लेगा। अगर रिलाईंस अपने टेन्डर में दिए उत्पादन लागत यानि 240 करोड़ डालर पर क़ायम रहता तो उसे उतनी ही कीमत की गैस बेचने की इजाज़त होथी लेकिन अगर चार गुना लागत को कर लिया जाए तो उतनी ही कीमत की गैस उसे मुफ़्त में हासिल हो जाएगी। इस लागत को निकालने के बाद जो गैस का उत्पादन होगा उसमें सरकार और रिलाईंस दोनों का हिस्सा होगा। इसे प्रोडक्ट शेयरिंग कान्टेªक्ट कहा गया।
अब आप रिलाईंस की दूसरी चालाकी देखिए कि उसने अपनी केजी बेसिन के इस गैस ठेके में से 30 प्रतिशत हिस्सेदारी विदेशी कम्पनी यानि ब्रिटिश पेट्रोलियम को 720 करोड़ डालर में बेच दी। इससे पहले वह 10 प्रतिशत हिस्सेदारी नीको रिसोर्सेस लिमिटेड को बेच चुका था। आप ज़रा ग़ौर कीजिए कि उत्पादन लागत 240 करोड़ और उससे तीन गुना ज़्यादा कीमत रिलाईंस ने बीपी को हिस्सेदारी बेचकर कमा लिया। अब तो जो भी केजी बेसिन से उत्पादन होगा वह मुफ़्त में होगा। यह वैसा ही है जैसे टाटा ने 1658 करोड़ रुपए में सरकार से 2जी स्पेक्ट्रम खरीदा और उसका 26 प्रतिशत हिस्सा डोकोमो को 12924 करोड़ रुपए में बेच दिया इसतरह खरीदे गए मूल्य से लगभग आठ गुना ज़्यादा केवल 26 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचकर हासिल कर लिया और 74 प्रतिशत स्पेक्ट्रम मुफ़्त में बच गया।
अब उसी केजी बेसिन के ठेके के दूसरे पहलू पर आते हैं। जब गैस का ठेका लेलिया गया था उसी बीच श्री धीरुभाई अम्बानी की मृत्यु हो गई और तब दोनो भाईयों में सम्पत्ति के बंटवारे का विवाद शुरु हुआ। पेट्रोलियम उद्योग मुकेश अम्बानी के हिस्से में आया और गैस ब्लाॅक की गैस को बाँटने की बारी आई। दोनो में यह तय हुआ कि मुकेश अम्बानी अपने भाई अनिल अम्बानी को 17 साल तक उसके दादरी पावर प्लांट के लिए 2.34 डालर प्रति ब्रिटिश थर्मल यूनिट के हिसाब से गैस बेचेंगे। आपने देखा जनता की गैस को एक ठेकेदार 17 साल तक बेचने का सौदा कर रहा है। यह बात उस भरोसे को बताती है कि जनता की जिस चीज़ पर कब्ज़ा कर लिया है उसे हर हालत में बनाए रखना है और उसे वापस नही देना है। इसी दर पर गैस की आपूर्ति सरकारी बिजली कम्पनी एनटीपीसी को करनी थी लेकिन मुकेश अम्बानी अपनी बात से पलट गए और उन्होनें 4.2 डालर प्रति ब्रिटिश थर्मल यूनिट पर अनिल अम्बानी और एनटीपीसी को देने के लिए कहा। अनिल अम्बानी ने मुकेश अम्बानी पर समझौते से पलट जाने का मुकदमा दायर कर दिया लेकिन सरकार ने कीमत तय करने के लिए एक एमपावर ग्रुप आॅफ मिनिस्टर्स जिसकी अध्यक्षता वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी कर रहे थे बिठा दी जिसने गैस की कीमत 4.2 डालर प्रति ब्रिटिश थर्मल यूनिट कर दी। हालांकि मुकेश अम्बानी ने अदालत में बताया कि गैस उत्पादन की लागत 1.43 डालर प्रति ब्रिटिश थर्मल यूनिट आ रही है। अगर 2.34 डालर प्रति यूनिट कीमत रखी जाए तब भी दोगुना मुनाफ़ा मिल रहा था लेकिन मुफ़्त में हासिल सरकारी गैस ने लालच को बढ़ा दिया।
अब हम तीसरी बात पर आते हैं। रिलाईंस के पास जो केजी बेसिन में गैस ब्लाॅक हैं उसके निकट ही सरकारी कम्पनी आएनजीसी के भी गैस ब्लाॅक हैं। रिलाईंस ने तिरछी बोरिंग करके ओएनजीसी के गैस ब्लाॅक से उसकी गैस चोरी करनी शुरु कर दी। यह चोरी 2015 में पकड़ी गई और अधिकारियों ने रिलाईंस पर आरोप लगाया कि उसने 30 हज़ार करोड़ रुपए की गैस चुराई है। ओएनजीसी के अधिकारियों ने इसकी रिपोर्ट अपने मंत्रालय को की लेकिन मंत्रालय ने गैस चोरी की घटना से आंखे फेर ली तब अधिकारी दिल्ली हाईकोर्ट चले गए और अदालत ने जांच के आदेश दिए। जस्टिस एपी शाह की अध्यक्षता में जांच शुरु हुई और रिलाईंस के कहने से अमरीकी कम्पनी डी. एण्ड एम ने इस मामले को देखा और पाया कि 2009 से 2015 तक रिलाईंस ने लगभग 11000 करोड़ रुपए कीमत की सरकारी गैस चुराई है। इसपर जस्टिस श्री ए.पी. शाह ने 155 करोड़ डालर का जुर्माना रिलाईंस पर डाला लेकिन रिलाईंस ने इस जुर्माने के खिलाफ़ अदालत में अपील दायर कर दी।
चैथी बात रिलाईस को दिए गए ठेके में यह शर्त शामिल थी कि अगर निर्धारित मात्रा से कम गैस का उत्पादन रिलाईंस करेगी तो उसे नुक्सान की भरपाई करनी होगी। रिलाईंस इस शर्त से भी पलट गई। उसने वर्श 2011-12 में 35.33 मिमीएससीएम, 2012-13 में 20.88, 2013-14 में 9.77, 2014-15 में केवल 8.05 और 2017 में 7.8 मिमीएससीएम प्रति दिन गैस का उत्पादन किया इसपर सरकार ने अब तक 302 करोड़ डालर का जुर्माना लगाया है लेकिन रिलाईंस इसके खिलाफ़ भी मुकदमेंबाज़ी करने के लिए तत्पर है। इस पूरे विवरण को बताने का मकसद है कि रिलाईंस से जो स्टेट बैंक आॅफ़ इन्डिया ने पेमेंट बैंक लगाने में साझेदारी करने का समझौता किया है यह बैंक के लिए खतरे की घंटी है। रिलाईंस मुफ़्त में इतना बड़ा सरकारी नेटवर्क हासिल कर लेगा साथ ही जो 30 प्रतिशत हिस्सेदारी स्टेट बैंक की रखी है वह उसे कभी हासिल होने वाली नही है और जिस तरह से व केजी बेसिन में जनता के गैस ब्लाॅक पर कब्ज़ा करके बैठ गया है वैसे ही स्टेट बैंक के साथ होने वाला है। यानि स्टेट बैंक पर बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

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