श्रमिकों का 3 दिवसीय ऐतिहासिक विरोध


-नित्यानंद गायेन, नयी दिल्ली,
8 नवम्बर को मोदी सरकार की आपातकालीन नोटबंदी के एक साल पूरा होने पर देश भर में विपक्षी दलों ने काला दिवस मनाया था। जबकि भाजपा ने उस दिन को एंटी ’ब्लैक मनी डे’ यानि काला धन विरोध दिवस बता कर जश्न मनाया था।
नोटबंदी के एक साल पूरा होने और जीएसटी सहित केंद्र सरकार की तमाम जन विरोधी नीतियों के विरोध में देश भर के मजदूर संगठनों ने दिल्ली के संसद मार्ग पर 9 से 11 नवम्बर तक 3 दिवसीय क्रमिक धरना प्रदर्शन किया। इसमें देश के 10 श्रमिक संगठन शामिल हुए। इस धरने में बढ़ती महंगाई पर रोक लगाने, राशन प्रणाली को सार्वजनिक बनाने, श्रम कानून में संशोधन पर रोक लगाने, सभी को कम से कम 3000 रुपये पेंशन देने, न्यूनतम मजदूरी 18000 रुपये करने की मांग भी शामिल है। इसके अतिरिक्त सरकार से समान काम का समान वेतन देने, विनिवेश पर रोक लगाने, स्कीम कर्मियों को श्रमिक का दरजा देने, बोनस, पीएफ एवं इएसआइ पर लगी सीमा को हटाने की मांग भी सरकार से की गयी है। इस विरोध प्रदर्शन में केन्द्रीय ट्रेड यूनियन सीटू के साथ-साथ स्वतंत्र मजदूर,कर्मचारी फेडरेशन, एआईसीसीटीयू, यूटीयूसी, आईएनटीयूसी, टीयूसीसी एलपीएफ एचएमएस, इंटक टीयूसीसी, एकटसेवा, एलपीएफ कैसे संगठनों के साथ 1 लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए। इसमें भाजपा से जुड़ी ट्रेड यूनियन बी एम एस को छोड़कर सभी यूनियन इस विरोध में शामिल हुए।
पहले दिन यानि 9 नवम्बर को इस विरोध प्रदर्शन को सीपीआई नेता गुरुदास दासगुप्ता सहित कई मजदूर यूनियनों के नेताओं ने संबोधित किया। उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार की कठोर आलोचना करते हुए इसे जनविरोधी और मजदूर विरोधी सरकार करार दिया। उन्होंने श्रम -कानून, रोजगार,छंटनी, आर्थिक नीतियों और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे उठाए।
इस मौके पर न्यूजक्लिक से बात करते हुए आॅल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस ।प्ज्न्ब् की महासचिव अमरजीत कौर ने कहा मोदी की सरकार मजदूरों को नजरंदाज कर रही है। उन्होंने आगे कहा कि ये सरकार लोगों के लिए काम करने के बजाये, अमीरों को फायदा पहुँचाने के लिए सार्वजनिक संसाधनों का निजीकारण कर रही है।
इस विरोध प्रदर्शन में सबसे अधिक लोग दक्षिण भारत के दो राज्य तमिलनाडु और केरल से शामिल हुए। इसके अलावा बिहार, बंगाल, झारखण्ड, उत्तरप्रदेश और पंजाब से भी भारी संख्या में किसान-मजदूरों ने शामिल होकर विरोध जताया। निर्माण श्रमिकों ने मोदी सरकार से सवाल किया कि “हमारे लिए बनायी गयीं कल्याणकारी योजनायों का सारा पैसा कहाँ गया ?“ मजदूरो ने अपने लिए बुनियादी न्यूनतम मजदूरी की मांग को दोहराया, जो सरकार ने मात्र 10,000 रुपये पर तय कर दी है। उन्होने अपने लिए पेंशन जैसे आवश्यक लाभों की भी मांग की। धरने के दूसरे दिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और इंश्योरेंस कर्मचारी मोदी सरकार के बैंक और इंश्योरेंस के निजीकरण करने के प्रयासों का विरोध करने संसद भवन के सामने इकटठा हुए। वे देश की अर्थव्यवस्था में बैंक और इंश्योरेंस सैक्टर के योगदान की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करवाना चाहते थे। साथ ही वे बैंकों में लाखों पदों के खाली रहने के बावजूद नए लोगों को रोजगार देने से सरकार के इनकार किये जाने के निर्णय पर अपना विरोध जताया।के खाली रहने के बावजूद नए लोगों को रोजगार देने से सरकार के इनकार किये जाने के निर्णय पर अपना विरोध जताया।
असम और उडीसा से आई आशा कर्मचारियों ने सरकार से उनके काम के महत्त्व को पहचाननें और अपने लिए अपने काम के अनुसार वेतन की मांग की। बीड़ी और जरी मजदूर अपनी आवाज उठाने के लिए इस विरोध में बड़ी तादाद में आये। उन्होंने कहा कि हाल में लागू किये गए जीएसटी का करोड़ों बीड़ी मजदूरों पर बुरा असर पड़ा है। मजदूर प्रति दिन 12 घंटों से अधिक काम करते हैं। जी एस टी ने इन मजदूरों को बर्बाद कर दिया है। जीएसटी के कारण बेरोजगार होने वाली ,जरी का काम करने वाली महिलाओं ने इस नीति के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर किया।मजदूरों ने गाने गाकर और नारे लगाकर अपने विरोध को प्रदर्शित किया और साथ ही साथ सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ अपनी लड़ाई को बल दिया। मजदूरों ने नारे लगाये ’मोदी को जाना होगा और जीएसटी को अपने साथ ले जाना होगा।’ धरने के अंतिम दिन शनिवार, 11 नवम्बर की सुबह दिल्ली में महिलाओं का बड़ा जमघट लग गया। आशा कार्यकर्ताओं से लेकर आंगनवाडी कर्मचारियों तक हर क्षेत्र में काम करने वाली महिलाएं संसद मार्ग पर जमा हुईं और उन्होंने सरकार से अपने लिए बेहतर वेतन और भत्तों की मांग की। उनका कहना था कि वे जनता तक आवश्यक स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाएं पहुंचाने जैसा काम करती हैं। देश भर से आये हुए एक लाख से अधिक मजदूरों ने मोदी सरकार की जन विरोधी नीतियों के खिलाफ 3 दिनों तक अपना विरोध प्रदर्शित किया।

लेखक के बारे में

उत्तर छोड़ दें