लोकसभा चुनाव का उबाल – ज्ञानेंद्र पाण्डेय


2019 में होने वाले 17वीं लोकसभा के चुनाव में अभी लगभग 1 साल का वक्त बाकी है। 1 साल के बाद इन्हीं दिनों के आसपास 17वीं लोकसभा का गठन हो जाने की उम्मीद भी है। दलगत राजनीति के आधार पर कैसा होगा अगली लोकसभा का चेहरा, इस बारे में अभी बहुत कुछ साफ तौर पर तो नहीं कहा जा सकता लेकिन हाल ही में सम्पन्न कैराना लोकसभा के उपचुनाव ने जो नतीजे दिए है उससे सत्तारूढ़ भाजपा में खलबली है। कौन होगा अगला प्रधानमंत्री और किसकी बनेगी सरकार इस बारे में भी एक साल पहले कुछ कह पाना जल्दबाजी होगी लेकिन अगले चुनाव को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष ने जिस तरह मोर्चाबंदी करनी शुरू कर दी है उससे ऐसा लगता है कि सत्तारूढ़ भाजपा अगले चुनाव में 2014 के आकड़ों से काफी पीछे रह जाएगी। मुद्दा केवल सत्ता पक्ष से जनता की नाराजगी का ही नही है बल्कि मुद्दा यह भी है कि इस बार विपक्ष ने एकजुट होकर भाजपा को चुनौती देने की तैयारी कर ली है। विपक्ष अगर एकजुट होने में कामयाब रहा तो भाजपा की राह आसान नहीं होगी।
2014 के बाद से अब तक जितने भी उपचुनाव हुए उनमें जहाॅ भी विपक्ष ने एकजुट होकर भाजपा उम्मीदवार के सामने अपना साझा उम्मीदवार खड़ा किया वहाॅ भाजपा को पराजय का सामना ही करना पड़ा। उत्तर प्रदेश को ही ले तो राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र गोरखपुर और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के संसदीय क्षेत्र फूलपुर से लेकर कैराना तक विपक्ष के साझा उम्मीदवारों ने भाजपा को चुनावी समर में पटखनी ही दी है। विपक्ष की एकता का यह प्रयोग चुनाव के बाद ही सही कर्नाटक में भी दोहराया गया और जो भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते एक दिन सरकार बनाने में कामयाब हो गई थी उसे भी विपक्षी एकता के सामने सरकार छोड़नी पड़ी।
विपक्ष इसी प्रयोग को इस साल के अंत में होने वाले मध्यप्रदेश, राजस्थान, और छत्तीसगढ़ में राज्य विधानसभा के चुनाव में भी दोहराना चाहता है। विपक्ष को उम्मीद है कि इन राज्यों में चुनावी एकजुटता का लाभ उसे अवश्य मिलेगा। उधर, राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी दलों को एक जुट करने की मुहिम में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के नेता शरद पवार, माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचुरी, बीजू जनता दल के अध्यक्ष और उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी और राष्ट्रीय जनता दल समेत अनेक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों के भाजपा विरोधी नेताओं ने भी अपने-अपने स्तर पर विपक्ष को मजबूत बनाने और अगले चुनाव में मिलकर लड़ने की कोशिशें तेज कर दी हैं। विपक्ष के खेमे में होने वाली इस हलचल से सत्तापक्ष भी हरकत में आया है और भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े और दलित वर्ग की नाराजगी को दूर करने के प्रयास भी तेज कर दिए हैं। इसी कड़ी में सत्तापक्ष ने नाराज किसानों को भी मनाने की रणनीति अपनाने के तहत ही न केवल गन्ना किसानो को उनकी उपज का लाभ दिलाने की गरज से कई हजार करोड़ के पैकेज का एलान किया है बल्कि सत्तापक्ष की कोशिश यह भी है कि विपक्ष एकजुट न हो सके।
सरकार के प्रति और खासकर इसके मुखिया नरेन्द्र मोदी के प्रति जनता की नाराजगी का एक पैमाना तो किसान आंदोलन के रूम में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत अनेक राज्यों में देखने को मिल ही रहा है। उधर केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली में भी भाजपा के प्रति मोह कम होने के संकेत मिल रहे हैं। दिल्ली में अगर कांग्रेस की तरफ से कराए गए एक सर्वे को कुछ आधार मानें तो दिल्ली में अभी चुनाव होने के स्थिति में कांग्रेस को 7 में से 5 लोकसभा सीटों पर जीत मिल सकती है। सर्वे के मुताबिक अगर अभी चुनाव हुए तो कांग्रेस को दिल्ली में विधानसभा की सीटों पर 41.2 प्रतिशत वोट मिल सकते हैं जबकि लोकसभा में उसको मिलने वाले वोट का प्रतिशत 38.1 होगा। कांग्रेस की तुलना में आम आदमी पार्टी को लोकसभा में 16.8 और विधानसभा में 22.9 प्रतिशत वोट मिलेंगे। इसके विपरीत भाजपा को लोकसभा में 27.4 और विधानसभा में 23.9 प्रतिशत वोट मिलेंगे। इस लिहाज से देखंे तो दिल्ली में इस सर्वे के मुताबिक कांग्रेस आप और भाजपा दोनों से आगे है। दिलचस्प बात यह है कि इसी सर्वे में जहाॅ प्रधानमंत्री के तौर पर 35.3 प्रतिशत लोग नरेन्द्र मोदी को बेहतर मानते हंै वहीं कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को 39.8 लोगो नें प्रधानमंत्री पद के लिए योग्य उम्मीदवार बताया है। मोदी और राहुल गांधी की तुलना में केवल 10.7 प्रतिशत लोगों ने अरविन्द केजरीवाल को प्रधानमंत्री पद के लायक समझा है लेकिन एक मुख्यमत्री के रूप में अरविन्द केजरीवाल आज भी सबसे आगे हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर जहा 28.2 प्रतिशत लोगों ने अरविन्द केजरीवाल को सबसे उपर रखा है वहीं कांग्रेस के अजय माकन को मुख्यमंत्री के तौर पर पसंद करने वाले लोगों का प्रतिशत 26.7 है। इस लिहाज से कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और दिल्ली प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष मनोज तिवारी 11.5 प्रतिशत के साथ एक ही पायदान पर हैं। कांग्रेस के लिए जिस एजेंसी ने दिल्ली के चुनाव का यह सर्वे करवाया है उसी एजेंसी ने स्वराज इंडिया के मुखिया योगेन्द्र यादव के लिए भी सर्वे करवाया था। सर्वे में कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि राजधानी में अभी भी युवा वर्ग की पहली पसंद नरेन्द्र मोदी ही है। वही दिल्ली में बिजली-पानी, सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की सुविधाओं को लेकर लोग आप सरकार के कामों से खुश नजर आ रहे है। कांग्रेस के लिए राहत की बात यही है कि लोग अब पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल में किए गए विकासकार्यो को पसंद करने लगे हैं। विपक्षी एकता के संदर्भ में दिल्ली की राजनीति इस लिहाज से थोड़ा अलग है कि यहाॅ केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ, आप और कांग्रेस दोनों ही मैदान मे है और यह दोनों ही पार्टिंया फिलहाल मिलकर चुनाव लड़ने के मूड में नहीं है।

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