रंगकर्मी एवं अभिनेत्री कल्पना झा से आनंद गुप्ता की बातचीत


– अभिनय की तरफ रूचि कैसे पैदा हुई?
रुचि का तो पता नहीं, पर मुझे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। हमारी पढ़ाई लिखाई ऐसे विद्यालय में हुई जहाँ सांस्कृतिक कार्यक्रम बिल्कुल भी नहीं आयोजित किए जाते थे। न जाने कितने संभावनाशील बच्चों की प्रतिभाएँ सुप्त ही रह गई होंगी। प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला होने के बाद दृश्य बदले।
मैं वहाँ होने वाले नाटकों में दूसरे छात्र छात्राओं को अभिनय करते हुए देख कर मंत्रमुग्ध हो जाती थी। एक बार वहाँ दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था। बांग्ला के सुपरिचित अभिनेता रमा प्रसाद बणिक ने संचालित की थी वह कार्यशाला। कैंटीन में चाय पीते हुए पता चला कि मेरा नाम भी लिखवा दिया है किसी ने। उन्होंने हम सभी को एक सिचुएशन दी , जिसपर प्रत्येक प्रतिभागी को 5 मिनट के अंदर अभिनय करके दिखाना था । मेरी बारी भी आई और उसके बाद जो कुछ हुआ वो मेरे वश में नहीं था। मैंने दूर से बैठ कर खुद को नए सिरे से देखा, जाना और पहचाना था उस दिन। उसके बाद से यह जरूरत सा बना हुआ है।
– अभिनय के पहले अनुभव के बारे में बताएं।
कलकत्ता विश्वद्यालय में प्रेमचंद जयंती का आयोजन किया गया था, जिसमें सद्गति कहानी पर नाटक मंचित किया जाना तय हुआ था, उसमें मुझे दुखी चमार की पत्नी का किरदार मिला था। वह नाटक अजहर भाई (अजहर आलम )और उमा दी( उमा झुनझुनवाला) के निर्देशन में तैयार किया गया था। आज भी कुछ लोग उस प्रस्तुति में मेरे अभिनय को जब याद करते हैं, तो बहुत खुशी होती है। हर बार एक नए किरदार को जीना अपने आप में एक नायाब अनुभव है, जिसे शब्दों में बयाँ कर पाना जरा कठिन है। पहले अनुभव से लेकर अब तक हर बार नए सिरे से शुरुआत करनी पड़ती है। मंच के मूलभूत कायदे कानून सीखे और याद रखे जा सकते है, पर किरदार निभाने की कोई प्रक्रिया मुझे मालूम नहीं, इसलिए उसकी शुरुआत हर बार सिफर से होती है वरना एक किरदार की छाया दूसरे पर पड़ने का डर भी रहता है। कुल मिलकर यह एक अनवरत कोशिश है।
– आपके अंदर के कलाकार को किसने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है?
मंच की गंध मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। जैसे वह किसी और दुनिया की सैर करने की जगह हो। इसके अलावा मुझे सारे संघर्षशील, जुझारू और विनम्र कलाकार बहुत प्रभावित करते हैं। कोलकाता के नाटकों में निर्देशक के तौर पर मुझे अजहर भाई, ऊषा गांगुली और विनय शर्मा प्रभावित करते हैं। फिल्मों में स्मिता पाटिल, शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह और ऐसे अनेकों नाम हैं, जिनके अभिनय में कमाल का जादू है।
– अभी आपने पंचलैट फिल्म के माध्यम से फिल्म जगत में कदम रखे हैं। कैसा अनुभव रहा?
एकदम नया और अनोखा। मैंने इसके हर पल को जिया और सीखा है। कैमरे के सामने भी और पीछे भी। नाटक और फिल्म बिल्कुल ही भिन्न माध्यम हैं। पहली बार होने की वजह से जो विशेष अन्तर महसूस हुआ वह ये कि एक तो नाटक के विपरीत यहाँ आप अपने किरदार को एक बार में नहीं जी सकते और दूसरे, टुकड़ों में भी कौन सा सीन कब शूट किया जाएगा ये अलग दृष्टि से तय किया जाता है। हो सकता है कि पहला सीन एकदम आखिर में लिया जाय और आखिरी सीन सबसे पहले। वे अलग तरह से सीन डिवीजन करते हैं, उसमें शूटिंग के दौरान कहानी को शुरू से आखिर तक की यात्रा नहीं कराई जाती। वह सब जोड़ घटाव एडिटिंग टेबल पर होता है। पता होने के बावजूद व्यक्तिगत तौर पर इसे अनुभव करना अनोखा था।
– आप साहित्य की विद्यार्थी रही हैं और पहली फिल्म ही साहित्यिक कृति पर बनी है।आप साहित्य और सिनेमा के अंतर्संबंध को कैसे देखती हैं?
रेणु की कहानी पर बनी फिल्म पंचलाइट में काम करना मेरे लिए बहुत गौरव की बात है। कभी फिल्मों के बारे में सोचा ही नहीं था, न ही कभी कोई कोशिश की या उत्साह दिखाया था उस ओर । पर जब इस फिल्म के लिए फोन आया था राकेश भैया का, तो ना करने की कोई गुंजायश ही नहीं थी। बहुत खास है यह फिल्म।
साहित्य और सिनेमा दोनों ही विधाएँ बहुत अलग होते हुए भी बहुत स्तर पर समानता रखती हैं। दोनों की सृजन प्रक्रिया और प्रभाव में अन्तर है, पर अंतत दोनों ही जीवन से जुड़ी विधाएँ हैं। बावजूद इसके सिनेमा से साहित्य की दूरी हमेशा रही है। विशेष तौर पर हिन्दी साहित्य और हिन्दी सिनेमा। वहीं बांग्ला सिनेमा इस मामले में अलग उदाहरण पेश करता है।बहुत सी बंगाली रचनाओं पर फिल्में बनी हैं और सफल रही हैं। हिन्दी साहित्य को सिनेमा से जोड़ने की बहुत सी कोशिशें होती रही हैं समय समय पर, लेकिन अभी भी उस बिन्दु पर पहुँचना बाकी है जहाँ साहित्यिक कृत्यों पर बनी फिल्मों को वह स्वीकृति मिले जिसकी वो हकदार हैं। दरअसल साहित्यिक कृतियों पर फिल्म लेखन और निर्माण एक मुश्किल काम है। कहानी-उपन्यास इत्यादि का सृजन नितांत व्यक्तिगत संवेदना के स्तर पर होता है, जबकि फिल्म निर्माण उससे आगे की सीढ़ी है। उसे दृश्य, ध्वनि, तकनीक, निर्देशकीय दृष्टि, कलाकार इत्यादि अनगिनत बातों से होकर गुजरना है, इसके अलावा बाजार तो है ही। शिक्षितों की विधा साहित्य को लोक तक ले जाने की चुनौती अलग। साहित्य में मनोरंजन पक्ष प्रधान नहीं, जबकि फिल्म में यह भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। अमूर्त को मूर्त रूप देना और इसकी तमाम चरणबद्ध प्रक्रियाएँ हैं। मुझे लगता है कि इन सारी मुश्किलों के बावजूद साहित्य के पास सिनेमा को देने के लिए बहुत कुछ सार्थक है और और इस पर बहुत काम होना चाहिए। एक कलाकार की हैसियत से भी यह प्रत्येक कलाकार की ख्वाहिश होती है कि वह ऐसा काम करे जिससे उसे आत्मिक संतुष्टि मिले और साहित्यिक कृतियों में यह क्षमता है।
– फिल्म और नाटक में अभिनय का क्या अंतर आपने महसूस किया?
सिनेमा असल जीवन की तरह ही है, उसमें नाटकों की तरह अभिनय और भाव भंगिमाओं से मंच पर चीजें क्रिएट नहीं करनी पड़ती। वहाँ हर चीज अपने असल रूप में मौजूद रहती है। अभिनय भी नाटकों में सिनेमा की अपेक्षा लाउड होता है। संवाद और भाव भंगिमाएँ सिनेमा में अधिक सहज, संतुलित और नियंत्रित रखने होते हैं क्योंकि कैमरा चेहरे की हर छोटी से छोटी हरकत को बारीकी से पकड़ लेता है और एक गलत भाव आपको आपके किरदार से बाहर ला सकता है।
– किसके साथ काम करना आपको सबसे ज्यादा चैलेंजिंग लगा?
सबसे सुखद यही बात रही कि इस फिल्म में किसी के साथ काम करना चैलेंजिंग नहीं लगा, बल्कि यशपाल शर्मा जैसे समर्थ कलाकारों के साथ काम करना भी बहुत सहज और आनंददायक था। इसकी वजह से कुछ एक सीन में हमने आपस में बातें कर सीन समझ कर शॉट दिया, ताकि स्क्रीन पर सही केमिस्ट्री दिख सके । शायद पहली ही बार एक बहुत अच्छी टीम मिलने की वजह से ऐसा हुआ कि सबके साथ ऑनस्क्रीन और ऑफ स्क्रीन केमिस्ट्री बहुत अच्छी रही। थियेटर के बहुत से कलाकार होने की वजह से माहौल बहुत अजनबी नहीं था।
– अगर मौका मिले तो किसके साथ काम करने का सपना आपका रहा है?
ऐसा कोई सपना तो नहीं रहा है। अच्छा काम करते रहने की इच्छा है, बाकी रास्ते खुद तय होते जाएँगे।
– आज नाट्य जगत नाटक के अस्तित्व को बचाये रखने के लिए संघर्ष कर रहा है। आखिर नाटक को कैसे बचाये रखा जा सकता है?
नाटक की परंपरा सर्वाधिक प्राचीन है। इसके अस्तित्व को किसी से कोई खतरा नहीं है। हाँ, इसकी अपनी लड़ाइयाँ हैं, भीतर और बाहर की। बाजार बहुत बड़ी चुनौती है नाटक के लिए, क्योंकि नाटक की प्राथमिकता बाजार कभी नहीं रही जबकि आज हर जगह बाजार ही हावी है। इसने लोगों के मानसपटल और अभिरुचियों पर भी कब्जा जमा लिया है। नाटक को दर्शक चाहिए, और बाजार निर्मित आधुनिक जीवनशैली ने दर्शकों को शॉर्टकट मनोरंजन के असंख्य आसान और सस्ते विकल्प मुहैया करा कर नुकसान तो पहुँचाया है पर नाटक हमेशा ही परचम फैलाते हुए जीवित रहेगा, क्योंकि यह लोगों की जीवन शैली में रचा बसा है। हर इंसान नाटक करता ही है, फिर चाहे वह मंच पर हो या मंच से परे। नाटक लोक से जुड़ी हुई विधा है। जब तक लोक है, नाटक भी है।
– भविष्य के बारे में क्या योजनाएं हैं?
यह एक कठिन प्रश्न है। इस मामले में कमजोर हूँ। योजनाएं बना कर काम नहीं कर पाई कभी। बस एक ललक है अच्छा काम करते रहने और सीखते रहने की। यह ललक अपना रास्ता खुद तय करती आई है। संभव है आगे भी यही तय करेगी।
– परिवार, सरकारी नौकरी और अभिनय के बीच आप कैसे सामंजस्य बनाती हैं?
यह बिल्कुल भी आसान नहीं है। मैं ही नहीं, बल्कि जितनी भी कामकाजी औरतें हैं उन सबकी कठिनाई है यह, दोहरी तिहरी जिम्मेदारियाँ निभाना , समय और रिश्तों के बीच समंजस्य और संतुलन बनाना। लेकिन दुष्कर होते हुए भी यह असंभव तो नहीं। हाँ, जीवन में कई बार प्राथमिकताओं को देखते हुए निर्णय लेने पड़ते हैं। अपनी जिम्मेदारियों और रिश्तों को पहले पायदान पर रखना पड़ता है। पर सबसे जरूरी बात है सकारात्मक रहना और हौसला रखना। बहुत सालों बाद जब इस क्षेत्र में वापस लौटी तो परिवार का बहुत सहयोग मिला। यहाँ तक कि बच्चे भी मेरे काम को लेकर उत्साहित रहते हैं।

लेखक के बारे में

उत्तर छोड़ दें