मुक्त बाज़ार की राह में बाधक नियम और कानून


लेख- मुशर्रफ़ अली
16 मई 2014 को श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद ही अगस्त 2014 में एक कमेटी का गठन कर दिया जिसको उन कानूनों की पहचान का काम दिया गया जो समाप्त होने अथवा बदले जाने हैं। इससे पूर्व एनडीए-1 ने भी श्री राम जेठमलानी के काननू मंत्री काल में अनेक कानून समाप्त किए थे। 24 सितम्बर 2014 को मोदी सरकार के केन्द्रीय संचार व प्रोद्योगिकी व कानून व न्यायमंत्री मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद का अख़बारों में बयान छपा जिसमें उन्होंने कहा कि वह गवर्नेन्स में बाधक, सैकड़ों साल पुराने कानूनों व नियमों को रद्द करेंगे। इस घोशणा के तीन साल बाद 22 जून 2017 को खबर छपी कि मोदी सरकार ने 1200 कानून रद्द कर दिए हैं और 1824 काननूों की बदले जाने के लिए उनकी पहचान कर ली है।
पुराने कानून व नियम जो अपनी उपयोगिता खो चुके हैं निश्चय ही बदले जाने चाहिए, लेकिन अगर वह देश की सम्प्रभुता और आत्मनिर्भरता को न सिर्फ बनाए रखने बल्कि उसे मजबूती देने वाले हों तो उन्हें रद्द करने का कोई औचित्य नही है। संविधान कोई धार्मिक ग्रंथ नही है जिसमें लिखी किसी बात को बदला ही न जा सकता हो। कानून व नियम संविधान के निर्माण और उसको लागू किए जाने के बाद से ही अपनी ज़रुरत के हिसाब से बदले जाते रहे हैं, जिसका प्रमाण अबतक हुए अनेकों संशोधन है। असली मुद्दा इन्हें बदलने या समाप्त करने का नहीं, बल्कि बदले जाने के पीछे छिपे मकसद या नीयत का है। क्या इन्हें किसी खास विचारधारा या दृश्टिकोण के तहत रद्द किया जा रहा है? यह असली सवाल है। कानून अगर बहुसंख्यक मेहनतकश जनता के विकास में रुकावट बनने लगें तो उन्हें बदला जाना ज़रुरी होता हैं। आज़ादी के बाद खाद्यान्न की समस्या को हल करने के लिए ज़रुरी था कि ज़मीदारी प्रथा को समाप्त किया जाए और सीलिंग लगाकर हासिल अतिरिक्त ज़मीन को भूमिहीनों में बाँटा जाए। जब यह काम शुरु किया गया तो ज़मींदार, सम्पत्ति के मौलिक अधिकार को लेकर अदालत चले गए और अदालत ने उनके पक्ष में फैसला सुना दिया। इससे ज़मीन के बंटवारे में रुकावट खड़ी हो गई। तब सरकार ने संविधान संशोधन करके उसमें अनुसूचि-9 को जोड़ा। इस अनुसूचि में डाले गए कानून को कोर्ट में चुनौती नही दी सकती थी। इस तरह ज़ब्त की गई ज़मीनों का भूमिहीनों में बंटवारा मुमकिन हुआ। बैंको के राश्ट्रीयकरण के मामले में भी यही रुकावट आई तब 24 व 25 वां संविधान संशोधन किया गया और बैंको के राश्ट्रीयकरण के लक्ष्य को हासिल किया गया। आपको याद दिलाना ज़रुरी है कि हम अनाज के मामले में पहले अमरीका पर निर्भर थे। हमारी इस कमज़ोरी के कारण वह हमपर दबाव बनाता था कि विदेशी राजनीति में हम उसका समर्थन करें। वियतनाम की लड़ाई में जब श्रीमति इन्दिरा गाँधी ने उसका समर्थन नही किया तो तत्कालीन राश्ट्रपति लिंडन जान्सन ने पी.एल. 480 के तहत भेजा जाने वाला अनाज से भरा पानी का जहाज़ रोक दिया। इसके बाद इन्दिरा गाँधी अमरीकी राश्ट्रपति के सामने अनाज के लिए गिड़गिडा़ई नही बल्कि उन्होंने कृशि के विकास के वास्ते पंूजी की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिये बैंको के राश्ट्रीयकरण का फैसला लिया। सन् 1971 की बंगला देश की लड़ाई में जब तेल की निजी कम्पनियों ने भारत की वायु व जल सेना को तेल की आपूर्ति रोक दी तब इन्दिरा गांधी ने कानून बदलकर तेल कम्पनियों का राश्ट्रीयकरण किया और सुरक्षा से जुड़े भावी खतरे से देश को बाहर निकाला। इसी तरह नए कानून बनाकर खानों का राश्ट्रीयकरण किया गया और राजाओं के प्रिवीपर्स को बंद करना मुमकिन हो पाया।
हम आयात-निर्यात से जुड़े पुराने कानूनों को लेते हैं। आज़ादी के बाद हमने जो आत्मनिर्भर विकास का रास्ता अपनाया उसके तहत हमने आयात को हतोत्साहित व निर्यात को प्रोत्साहित करने वाले नियम व कानून बनाये। इसके लिए विदेशी सामानों पर अधिकतम सीमा-शुल्क 150 व न्यूनतम 72 प्रतिशत रखा। इसी तरह हमने आयात किए जाने वाले माल पर मात्रात्मक प्रतिबन्ध लगाया। 800 वस्तुओं को लघु उद्यौग क्षेत्र में बनाने के लिये आरक्षित कर दिया गया। आज़ादी के बाद बनाए गए इन पुराने कानूनों व नियम को लागू किए जाने से न सिर्फ हमारी विदेशी मुद्रा की बचत हुई बल्कि विदेशी सामानों के मंहगा हो जाने से देशी उद्योग को फलने-फूलने का अवसर मिला और राश्ट्रीय आय में वृद्धि हुई। यह जो आजकल वित्तीय व राजकोशीय घाटे का रोना रोया जा रहा है उसका एक बड़ा कारण आयातित-माल पर सीमा शुल्क कम अथवा न के बराबर किया जाना व आयकर स्लैब की ऊपरी सीमा को कम किया जाना है। टाटी-बिरला-अम्बानी ने भी अपनी आय का केवल 30 प्रतिशत आयकर देना है और 10 लाख रुपए वार्शिक पाने वाले एक कम्प्यूटर इंजीनियर को भी उसी स्लैब से आयकर देना है यह बात न्यायपूर्ण नहीं है। पहले आयकर की ऊपरी सीमा 97 प्रतिशत थी जिसे प्राप्त करके बजट घाटा कम किया जाता था। देश को आत्मनिर्भर व सम्प्रभु बनाने वाले पुराने कानून, लघु व देसी उद्योगों की सुरक्षा के लिए बड़े कारगर थे लेकिन 1991 के बाद आने वाली सरकारों ने यह कानून बदल दिए। इसका नतीजा यह निकला कि हमारा बाज़ार आयातित सामानों से भर गया। लघु उद्योग क्षेत्र में बड़े उद्योगों के प्रवेश ने इस आरक्षित क्षेत्र को तबाह कर दिया। इसके नतीजे में अपना रोज़गार गंवा देने वाले लोगों में इन सामानों के खरीदने की ताकत नही बची और इसका बाज़ार व देश की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा। अब अगर हम साम्राज्यवादी देशों व उनके विशालकाय बहुराश्ट्रीय निगमों के नज़रिए से सोचें तो निश्चय ही वह आयात के नियमों-कानूनों को अपने आर्थिक हित में बदलवाना चाहेंगे। वह आयात को प्रोत्साहित करने वाले कानून बनवाने के साथ-साथ यह कोशिश करेंगे कि सम्बंधित देश केवल कच्चे माल के निर्यात तक सीमित रहें। अगर कोई सरकार उनके दबाव में या उनके कहने से ऐसा करेगी तो निश्चय ही इसका देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा । ऐसी सरकार वित्तीय व राजकोशीय घाटे का बहाना लेकर जनता के कल्याणकारी व्यय में कटौती करेगी।
पुराने कानूनों-नियमों के बदले जाने ने भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर डाला है इसकी हम चन्द और मिसाले पेश करना चाहेंगे। पहले हम श्रम-कानून को लेते हैं। मुक्त बाज़ार के प्रबल समर्थक (देसी/विदेशी) यह दलील देते रहे हैं कि भारत के श्रम बाज़ार के लचीले न होने के कारण, विदेशी कम्पनियां, भारत में पूंजीनिवेश करने से जहाँ कतराती है वहीं देसी पंूजीपति इसे निर्यात- प्रतिद्वन्दिता में बाधक व उत्पादन घटाने वाला मानते हैं। वह चाहते हैं कि सरकार इसे अगर लचीला बना दे तो इससे न केवल विदेशी पंूजीनिवेश आएगा बल्कि उत्पादन और रोज़गार भी बढ़ेगा। कोई औद्योगिक फर्म अगर मज़दूरों की छटनी करना चाहे अथवा अपनी इकाई को बंद करना चाहे तो उसे इसके लिए सरकार से अनुमति लेनी पड़ती है और अनुमति मिलना लगभग नामुमकिन सा ही है। श्री अटल बिहारी बाजपेयी जी के ज़माने में इस समस्या से निजात पाने के लिये रविन्द्र वर्मा (यह श्री मोरारजी देसाई सरकार के कार्यकाल में लेबर मिनिस्टर )की अध्यक्षता में ‘‘द्वितीय राश्ट्रीय श्रम आयोग’’ का गठन किया गया, जिसने अपनी रिपोर्ट 29 जून, 2002 को सौंपी लेकिन श्री बाजपेयी, वामपंथियों और उनके मज़दूर संगठनों की हठधर्मी के कारण इसकी सिफ़ारिशों को लागू कराने में कामयाब नही हो पाए। अब अगर हम भारत के श्रमिक-कानूनों को वर्मा-आयोग की सिफ़ारिशों के आधार पर बदल देते हैं जैसा कि केन्द्र, राजस्थान व मध्य प्रदेश सरकार ने किया है तो निश्चय ही उद्योगपतियों का मुनाफ़ा तो बढ़ जाएगा लेकिन इससे श्रमिकों की ज़िन्दगी बेहद कश्टपूर्ण हो जाएगी। छटनी और तालाबंदी का अधिकार पंूजीपतियों को देने से बेरोज़गारी की दर आसमान छूने लगेगी जिससे छटनी शुदा मज़दूरों की खरीदने की ताकत काफ़ी कम हो जाएगी और हम एक नए आर्थिक संकट में पड़ जाएंगे। मौजूदा श्रम कानूनों को लागू नही किए जाने का परिणाम हम आज ‘पैकेज’ वाली नौकरियों में देख रहे हैं। निजी कम्पनियों में कार्यरत् इंजीनियर व प्रबन्धक बेहद तनाव में जीवन बिता रहे हैं। उनका समाजिक व परिवारिक जीवन लगभग समाप्त हो गया है और इस तनाव को दूर करने के लिए वह नशा व सेक्स के लिए आयोजित की जाने वाली ‘रेव-पार्टियों’ का सहारा ले रहे हैं। श्रम कानूनों को लागू नहीं किए जाने से निजी-क्षेत्र किस संकट से गुज़र रहा है इसका सबूत ‘विश्व स्वास्थय दिवस’ पर ‘एसोचेम’ द्वारा 2013 में निजी व सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों की स्वास्थय-समस्याओं पर ‘‘गवर्नमेन्ट वर्सेस प्रायवेट इम्प्लाईज़ हैल्थ सिनेरियो ’’ नाम से कराया गया सर्वे है। यह मुम्बई, देहली, अहमदाबाद, चन्डीगढ़, हैदराबाद, पूना, देहरादून, कोलकत्ता, चेन्नई सहित अनेक महानगरों में काम करने वाले सरकारी व निजी क्षेत्र के कर्मचारियों पर आधारित है। इसमें बताया गया है कि 85 प्रतिशत निजी क्षेत्र के कर्मचारी कार्य-दशा सम्बंधी गम्भीर बीमारियों का शिकार हैं जबकि सरकारी कर्मचारियों का प्रतिशत केवल 8 है। 5 अप्रेल 2013 को इसकी रिपोर्ट जारी करते हुए एसोचेम के जनरल सेक्रेटरी श्री डी.एस.रावत ने कहा कि इसका कारण महँगाई बढ़ने पर सरकारी कर्मचारियों को मँहगाई भत्ता मिलने की सुविधा है जबकि निजी-क्षेत्र के अधिकांश कर्मचारी इस सुविधा से वंचित हैं। निजी क्षेत्र में केवल 10 प्रतिशत कर्मचारियों का स्वास्थय बीमा हैं। डा0 बी0के0राव जो सर गंगाराम हाॅस्पिटल व एसोचेम हैल्थ कमेटी के अध्यक्ष हैं उनका कहना है कि निजी क्ष़्ोत्र के कर्मचारियों की जीवन-शैली उनके वैवाहिक जीवन पर बुरा असर डाल़ रही है, उसके कारण परिवारिक विवाद बढ़ रहे हैं जो उन्हें तनावग्रस्त व गम्भीर बीमारियों का शिकार बना रहे हैं। निजी व सरकारी क्षेत्र में मर्ज़ का प्रतिशत क्रमशः हाई ब्लड प्रेशर 65 व 13, स्ट्रेस 45 व 7, स्पेान्डीलाइसेस 25 व 5, दिल की बीमारी 45 व 12, अस्थमा 55 व 6, गठिया 65 व 20, स्लिप डिस्क 45 व 6, डायबिटीज़ 45 व 7, है। इसमे पहले नम्बर पर निजी व दूसरे पर सरकारी कर्मचारियों का प्रतिशत है।
भारत की दुनिया के 88 देशों से दोहरी कराधान सन्धि है। इसके तहत निवेशक कम्पनी या व्यक्ति को एक ही देश में टेक्स देना पड़ता है। विदेशी कम्पनियां टेक्स से बचने के लिए किसी ऐसे देश में अपनी कम्पनी का रजिस्ट्रेशन करा लेती है जिनसे भारत की दोहरी-कराधान सन्धि है। सिंगापुर व मारीशस दो ऐसे देश हैं जहाँ सबसे ज़्यादा विदेशी कम्पनियां रजिस्टर्ड हैं। यह कम्पनियां न तो अपने पंूजीनिवेश अथवा व्यापार से होने वाले मुनाफ़े पर भारत में कर चुकाती हैं और न ही उस देश में जहाँ वह रजिस्टर्ड हैं। इस तरह के दोहरे कराधान समझौते से भारत का बड़ा आर्थिक नुक्सान होता है। करों से बचने की इस कोशिश को रोकने के लिए पूर्व वित्तमंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने ‘जनरल एन्टी एवायडेन्स रुल्स’(गार) नामक नया कानून बनाया लेकिन पूरी दुनिया के पंूजीपतियों ने इसपर हंगामा काट दिया। इसी तरह ब्रिटिश कम्पनी वोडाफोन ने हचिन्सन नामक कम्पनी की भारत की हिस्सेदारी खरीद ली लेकिन यह खरीद विदेश में बैठकर की गई। इसपर आयकर विभाग ने 11 हज़ार करोड़ रुपए का प्रोपर्टी गेन टैक्स लगाया लेकिन कम्पनी इसके विरोध में अदालत मे चली गई और अदालत ने आयकर विभाग के खिलाफ़ फैसला देदिया। इसपर श्री मुखर्जी ने आयकर कानून में एक स्पश्टीकरण जोड़ते हुए उसे पीछे से(रेट्रोस्पेक्टिव) लागू कर दिया। इसतरह वोडाफोन जिसपर ब्याज़ सहित 20 हज़ार करोड़ रुपया बकाया हो गया था वह देने के लिए बाध्य हो गई। लेकिन वोडाफ़ोन कम्पनी ने कर नही चुकाया और विवाद अभी भी जारी है। टैक्स नही अदा करने वाली विदेशी कम्पनियों को राहत देने के लिए बस यह किया गया कि इन दोनों कानूनों को लागू किए जाने से रोकने के लिए श्री प्रणव मुखर्जी को वित्त मंत्रालय से हटाकर राश्ट्रपति भवन भेज दिया गया और उनके बाद बनने वाले वित्तमंत्री श्री चिदम्बरम ने उपरोक्त दोनों आदेशों को ठन्डे बस्ते में डाल दिया। नई सरकार भी इन कानूनों को ठन्डे बस्ते में डाले जाने की पक्षधर है और उसने भी इन्हे वहीं पड़े रहने दिया। यह दोनों कानून जो पुराने न होकर एकदम नए थे उनसे देश का भारी फ़ायदा होने वाला था। इन्हे लागू किए जाने से करचोरी व कालेधन पर रोक लगती लेकिन पुराने कानूनों को बदलने की घोशणा करने वाले, देसी-विदेशी उद्योगपतियों के हितों के खिलाफ़ जाने वाले किसी भी नए कानून के भी खिलाफ़ है। आज़ादी के बाद बनने वाले सारे कानून जिन्हे पुराना बताया जा रहा है वह पुराने नहीं, नए हैं। यह पुराने कानून मोदी सरकार द्वारा लागू की जारही मुक्त बाज़ार की आर्थिकनीति की राह में रुकावट बनकर खड़े हैं इसलिए पुराने के बहाने से इसे बदला जा रहा है। इन कानूनों को बदलने वाले, भारत की जनता को बजाए आगे लेजाने के और भी पुराने दौर में वापस लौटा देना चाहते है।

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