मजदूरों की एक बड़ी जीत,बाबा रामदेव की दिव्य फार्मेसी को उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिया बड़ा झटका

डीकेएस डेस्क, नई दिल्ली,
योग गुरु बाबा रामदेव की कंपनी दिव्य फार्मेसी को उत्तराखंड हाई कोर्ट से एक बड़ा झटका लगा है। हाई कोर्ट की एकलपीठ के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश केएम जोसफ और जस्टिस यूसी ध्यानी की खंडपीठ ने कंपनी को आदेश दिया कि 93 कर्मचारियों को साल 2005 के समझौते के अनुसार तय वेतन दिया जाए। कंपनी को पिछले 13 साल के वेतन के बकाए का भुगतान करना होगा।
याचिका में कहा गया कि मई 2005 में दिव्य फार्मेसी और कर्मचारियों के बीच वेतन को लेकर एक समझौता हुआ था। इसमें यह तय हुआ था कि अप्रैल 2005 से समझौते के मुताबिक तनख्वाह दी जाएगी लेकिन याचिका में कहा गया कि दिव्य फार्मेसी ने इस समझौते का पालन नहीं किया। इसके बाद समझौते का पालन नहीं होने से कंपनी के कर्मचारी साल 2013 में हाईकोर्ट पहुंचे। हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 2005 के समझौते को वैध करार दिया था।
फैसले के खिलाफ दिव्य फार्मेसी सुप्रीम कोर्ट पहुंची। सुप्रीम कोर्ट ने हरिद्वार के असिस्टेंट लेबर कमिश्नर को पूरे मामले को स्पष्ट करने के निर्देश दिए। असिस्टेंट कमिश्नर ने माना कि 93 कर्मचारी वास्तव में 2005 के समझौते के आधार पर वेतन पाने के हकदार हैं। उन्हें यह वेतन दिया जाए। लेबर कमिश्नर के इस आदेश के खिलाफ दिव्य फार्मेसी हाईकोर्ट पहुंची।
एकलपीठ ने मामले को सुनने के बाद लेबर कमिश्नर के आदेश पर मुहर लगा दी। इसके बाद दिव्य फार्मेसी ने खंडपीठ में विशेष अपील के जरिये एकलपीठ के आदेश को चुनौती दी। पूरे मामले में खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश पर मुहर लगाते हुए दिव्य फार्मेसी की विशेष अपील को खारिज कर अपना आदेश कर्मचारियों के पक्ष में सुना दिया। इस खबर को ज्यादातर मीडिया ने नहीं छापा ध् दिखाया। इसका क्या कारण है ? इसका कारण है कि टीवी हो या अखबार, रामदेव के पतंजलि उत्पादों के विज्ञापन से भरे पड़े हैं। मीडिया विजिल ने सामाजिक कार्यकर्ता मसऊद अख्तर के फेसबुक से इस मामले पर उनका यह पोस्ट प्रकाशित किया है -2005 में हुए बाबा रामदेव की कंपनी दिव्य योग फार्मेसी के मजदूरों का विवाद शायद ही याद हो। अरे वही विवाद जिसमें दिव्य योग फार्मेसी के मजदूरों ने अपने शोषण के साथ दवाओं में जानवरों की हड्डियों के चूरा के साथ मानव अंगों को मिलाने का आरोप लगाया था। उस वक्त मजदूरों की लड़ाई में वृंदा करात ने समर्थन व साथ दिया था। मनुष्य अंग होने की शंका तब हुई जब एक अंगुली की हड्डी में अंगूठी पाया गया। इससे जाहिर था कि वो हड्डी किसी मनुष्य की थी। इसपर मजदूर भड़क गए और हड्डी का चूरा मिलाये जाने की बात बाहर आ गयी। बाद में 21 मई 2005 को हरिद्वार के श्रमायुक्त ने कंपनी प्रबंधन व मजदूरों में समझौता करा दिया। समझौते के तहत जब दूसरे दिन मजदूर सुबह कामपर गए तो उन्हें गेट से वापस भगा दिया गया। श्रम अदालतों से लेकर हाई कोर्ट तक मजदूरों ने यह लड़ाई सीटू के नेतृत्व में लड़ी। और हाई कोर्ट ने मजदूरों को बड़ी राहत देते हुए दिव्य योग फार्मेसी को आदेश दिया है कि वो 93 मजदूरों को वापस काम पर रखे और 2005 से तेरह वर्षों का वेतन भी दे जो कि 14.50 करोड़ होता है। मजदूरों की यह एक बड़ी जीत है। सारे मजदूरों के साथ सीटू को बधाई।

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