भुखमरीः खिचड़ी, बिरियानी या दो मुठ्ठी भात !


हाल ही में खिचड़ी को देश का राष्ट्रीय व्यंजन बनाने के लिए खिचड़ी मीडिया द्वारा राष्ट्रव्यापी आन्दोलन चलाया गया। टीवी के पर्दे से लेकर इंडिया गेट तक खिचड़ी पकी । टीवी वाले खिचड़ी बनाने की विधि सीखाने लगे । खबरों से पता चला कि इंडिया गेट पर 800 किलो खिचड़ी पका कर भारत ने नया विश्व रिकार्ड बनाया ! वैसे कुछ मीडिया ने 1100 किलो भी बताया। खैर जो भी हो खिचड़ी पकी और खूब पकी।
खिचड़ी राजाजी के बीरबलों ने पकाई। वैसे भी उनका काम ही है समय-समय पर खिचड़ी पकाना। तो इस बार उन्होंने दाल-चावल की खिचड़ी पकाई। पर उस दिन खिचड़ी पकाऊ मीडिया ने दो मुठ्ठी भात के अभाव में मर गई 11 साल की संतोष कुमारी को याद नहीं किया। सब खाने-खिलाने और पकाने में उत्साहित थे। खिचड़ी स्वास्थवर्धक होने के साथ-साथ स्वाद में बहुत बढ़िया और आम व्यंजन है। बनाना भी बहुत सरल है। पर बढ़िया खिचड़ी के लिए दाल, चावल और घी या तेल तो चाहिए न ?
हाल ही में भारत ने वैश्विक भुखमरी सूची में उत्तर कोरिया बांग्लादेश और इराक को पछाड़ते हुए कुल 119 देशों में सौवां स्थान हासिल किया। पहले 97 वां स्थान था !
आईएफपीआरआई ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत के बच्चों में भुखमरी की समस्या सबसे ज्यादा कुपोषण की वजह से है। महारष्ट्र का विदर्भ क्षेत्र, ओडिसा का कालाहांडी जैसे कई चिन्हित क्षेत्र हैं देश में इनके अलावा भी लगभग हर राज्य में लाखों बच्चे और महिलाएं कुपोषण से ग्रस्त हैं। राष्ट्रीय खिचड़ी मुहीम दिवस पर दिल्ली में कई मशहूर बावर्चियों ने खिचड़ी पकाई और पता चला कि देश को राष्ट्र ऋषि प्रदान करने वाले परचून व्यापारी बाबा ने भी अपने घने केशों को ढककर खिचड़ी पकाई । न तो इस बाबा के पास देश के कुपोषित लोगों का आंकड़ा है न ही किसी शेफ के पास । उस दिन देश के स्वघोषित कई देसी नेताओं ने खिचड़ी आन्दोलन में शामिल होकर सेल्फी विद खिचड़ी खींची।
इधर खिचड़ी मुहीम चली उससे पहले संतोष कुमारी की माँ को 8 माह तक राशन नहीं मिला और संतोष भूख से मर गयी ! ऐसे कई संतोष और संतोषी देश में रोज भूख से मर जाते हैं जिनकी खबर हम तक नहीं पहुँचती। इस बीच एक और खबर मिली कि विशाखापत्तनम जिले के मुनगपाका मंडल गांव के लोग पिछले एक साल से मनरेगा में काम कर रहे हैं। लेकिन, उन लोगों को साल भर का मेहनताना अब तक नहीं मिल पाया है क्योंकि लोग अपने आधार कार्ड के विवरण को बैंक खाते से नहीं जोड़ पाये हैं ! खबरों के मुताबिक, आधार को कारण बता कर ही झारखण्ड में कई परिवारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली से अलग कर दिया गया है । ये कैसा आधार है जिसके बिना गरीबों के जीने का आधार ही समाप्त हो रहा है ? अब तो आधार बिना लोग फोन पर बात नहीं कर पायें शायद क्योंकि सरकार ने कहा है – फोन कंपनियों को आधार नम्बर देना जरुरी है वर्ना फोन बंद । अब मरने के बाद मर जाने का प्रमाण-पत्र भी बिना आधार नहीं मिलेगा ! जीने की बात तो दूर ।
वैसे खिचड़ी पकाना एक मुहावरा भी है – जिसका मतलब है – झोल करना, गोलमाल की साजिश करना ।
एक और है ‘अपनी खिचड़ी अलग पकाना।’ इसका मतलब है -अलग-थलग रहना, किसी के सुख-दुख में भागीदार न होना।
इस वक्त देश में दोनों ही तरह की खिचड़ी पक रही है । पकाने वालों को पहचानिए ।

विश्वविद्यालय का प्रशासन
देश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में गिने जाने वाला जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय 2014 के बाद से लगातर किसी न किसी अप्रिय घटना के लिए सुर्खियों में है। सबसे पहले बीजेपी के एक नेता ने कहा जे एन यू में राष्ट्र विरोधी गतिविधियाँ होती हैं, यहाँ नक्सली और आतंकवादी बनाये जाते हैं, जे एन यू में देशद्रोही रहते हैं ! फिर उसी हवा में एक और भाजपा नेता ने कहा -जेएनयू में रोज सैकड़ो कंडोम मिलते हैं आदि आदि…। जे एन यू के वर्तमान उपकुलपति प्रो. जगदीश कुमार पक्के वाले राष्ट्रवादी हैं और उन्होंने वक्त-बेवक्त इसका प्रमाण दिया है। जे एन यू में उनके आने के बाद कारगिल विजय दिवस मनाया गया और इस अवसर पर सेना के एक पूर्व जनरल को भी आमंत्रित किया था। उस दिन उन्होंने यूनिवर्सिटी के छात्रों में देशभक्ति की भावना जगाने के लिए परिसर में सैनिक टैंक रखवाने की मांग रखी सरकार से ! इसी मौके पर किसी ने कहा-जेएनयू पर सेना ने कब्जा किया। वामपंथी छात्र नेता राष्ट्र विरोधी हैं ! अगले दिन यह बात अनेक मीडिया की सुर्खियाँ बनी। अब मामला है कि विश्वविद्यालय कोई प्राइमरी स्कूल तो है नहीं फिर भी वहां प्रशासनिक स्तर पर ऐसी हरकतें ! देश का वर्तमान और प्रथम महिला रक्षा मंत्री महोदया भी जेएनयू से पढ़ी हुई हैं। कई बड़े प्रशासनिक अधिकारी और सलाहकार भी यहीं से पढ़े हुए हैं। कई नामी पत्रकार और नेता भी जेएनयू से हैं। फिर भी इस तरह की घटनाएं ? दरअसल बात यह है कि यूनिवर्सिटी के छात्र सरकार की गलत नीतियों का विरोध करते हैं और वजीफा मांगते हैं और यह पूरे विश्व में जहाँ-जहाँ लोकतंत्र हैं वहां ऐसा होता है। रोहित वेमुला की मौत को याद कीजिये जहाँ से देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्र आन्दोलन तेज हुआ और छात्र सड़कों पर उतरे। याद कीजिये बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में अपने लिए न्याय मांगती छात्राओं पर पुलिस ने किस बर्बरता से लाठी चलाई थी ! और वीसी लगातर झूठ बोलते रहें मीडिया से। दिल्ली आकर छिपे। इलाहबाद, अलीगढ़ लगभग सभी जगह इस तरह की घटनाएँ हुई। क्या इसे सरकार का भय नहीं कहा जाना चाहिए ?
अब दो मामले है। पहला यह कि जवाहर लाल नेहरू विविद्यालय के प्रशासनिक ब्लॉक के निकट बिरयानी पकाकर संस्थान के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप में विविद्यालय के अधिकारियों ने चार छात्रों पर जुर्माना लगाया है।
मुख्य प्रॉक्टर कौशल कुमार की ओर से जारी नोटिस के अनुसार चार छात्रों पर 6,000 रुपये और 10,000 रुपये के बीच जुर्माना लगाया गया है। इन छात्रों ने जून में भवन के निकट कथित रूप से बिरयानी पकायी थी। अब जब देश में राष्ट्रीय स्तर पर खिचड़ी आन्दोलन चलाया जा रहा है ऐसे में प्रशासन को जब बिरियानी पकाने की खबर मिलेगी तो जुर्माना तो लगेना न ! वैसे भी इस वक्त देश और यूनिवर्सिटी में शाकाहारी प्रशासन है । ऐसे में मांसाहारी बिरियानी पकाना अपराध है। अखलाक, पहलू खान और कई जुनैद कत्ल कर दिए गये इस दौरान। कातिलों को सम्मान और शासन से संरक्षण भी मिला। पहलू खान और जुनैद के कातिलों को पुलिस और सरकारी वकील ने निर्दोष करार दिया। ऐसे में छात्र यूनिवर्सिटी कैम्पस में बिरियानी कैसे पका सकते हैं ?
दूसरा मामला है कि सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी ने पोस्ट ग्रेजुएट में मेधावी छात्रों को गोल्ड मेडल देने के लिए शर्त रख दी है।
विश्वविद्यालय ने कहा है कि जो छात्र आवेदन करेंगे उन्हें शाकाहारी और शराब न पीने वाला होना चाहिए! तो जो मांसाहारी है वो छात्र स्वर्ण पदक की उम्मीद कभी न रखें ! भले ही वो कितना ही प्रतिभाशाली क्यों न हो।

इनसे हट कर
सरकार ने 8 नवम्बर को देश भर में नोटबंदी के एक वर्ष पूरे होने पर जश्न मनाया। लोगों ने काला दिवस मनाया और 9 से 11 नवम्बर तक दिल्ली में 10 मजदूर संगठनों के अधीन देश भर से 1 लाख से अधिक मजदूरों ने नोटबंदी और जीएसटी के विरोध में महा विरोध किया। जीएसटी में सब कुछ ठीक होने का दावा करने के बाद गुजरात और हिमाचल में चुनाव आचार सहिंता के बीच मोदी जी ने जीएसटी दरों में बदलाव किया इससे पहले दिवाली के ठीक पहले भी कटौती कर मोदी जी ने कहा था। दिवाली से पहले दिवाली आ गयी। निष्पक्ष चुनाव आयोग गुजरात में बाढ़ की स्थिति सुधरने का इन्तेजार करने की बाद लगातर खामोशी से सब कुछ देख रहा है।
जय हिन्द!

– नित्यानंद गायेन

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