पत्रकार पर ही वार !


– प्रभात पाण्डेय
25 अक्तूबर 2017 के अखबारों की दो खबरों ने ध्यान आकर्षित किया. पहली खबर वसुंधरा राजे सरकार के आपराधिक कानून (राजस्थान संशोधन) विधेयक – 2017 से संबंधित है. यह विधेयक 23 अक्तूबर को राजस्थान विधानसभा में पेश किया गया था, लेकिन कड़ी निंदा के कारण बाद वाले दिन ही सिलेक्ट कमेटी के हवाले हो गया. खुद भाजपा के ही वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी ने इसे काला कानून बताया और इसको वापस लेने की मांग की. दरअसल प्रस्तावित संशोधन राज्य के किसी भी लोकसेवक – मुख्यमंत्री, मंत्री, चुने हुए प्रतिनिधि, सरकारी कर्मचारी और न्यायपालिका के सेवारत या सेवानिवृत्त कर्मचारी – के खिलाफ राज्य सरकार की मंजूरी के बगैर एफआइआर या प्रारंभिक जांच की अनुमति नहीं देता है और इसके उल्लंघन पर अर्थदंड एवं दो साल की कैद की बात करता हैं. इसके प्रावधान पत्रकार तथा मीडिया पर भी समान रूप से लागू होते हैं.
इस विधेयक से जुड़े विवादों के बारे में सरकार का कहना है कि फर्जी और हल्के मामलों से न्यायपालिका तथा नौकरशाही कि रक्षा करने के उद्देश्य से इस विधेयक की बात सोची गई. राज्य के गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया के कहे अनुसार राज्य में तकरीबन 36 प्रतिशत एफआइआर मजिस्ट्रेट के माध्यम से सीआरपी की धारा 156 (3) के तहत दर्ज कराए गए. इस धारा का प्रावधान पुलिस द्वारा एफआइआर दर्ज नहीं करने पर फरियादी को यह सहूलियत देता हैं कि वह मजिस्ट्रेट से ऐसा करवा सके. कटारिया के मुताबिक 2013 से जून 2017 के बीच राज्य में दर्ज कराए गए मामलों की संख्या 2,47,756 थी जब कि महज 60,740 मामलों में ही चालान किया गया. वहीं विपक्ष का कहना है कि यह विधेयक सरकार की तानाशाही मानसिकता को दर्शाता है और वह प्रेस का दमन कर भ्रष्टों को सुरक्षित करना चाहती है. एडिटर्स गिल्ड ने भी प्रतिरोध जताते हुए कहा है कि यह विधेयक संविधान में दी गई प्रेस की आजादी पर कुठाराघात है और मीडिया को तबाह करने का एक घातक हथियार. दरअसल, यह मीडिया ही है जो किसी भी व्यक्ति द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी को लोगों तक पहुंचाता है. ऐसे में किसी भी नेता या अधिकारी या जज के बारे में प्राप्त सूचना के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने के पहले सरकार की अनुमति की अनिवार्यता व्यक्ति के साथ-साथ मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला है.
दूसरी खबर यह कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की 20 अक्तूबर 2017 को राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों को पत्रकारों की सुरक्षा संबंधी एक एडवाइजरी जारी की गई है. यह एडवाइजरी कहती है कि ‘चैथा एस्टेट’ यानी ‘चैथा खंभा’ या मीडिया प्रजातंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है जो सुनिश्चित करता है कि संविधान के तहत अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार नागरिक को बेखौफ और बगैर किसी दबाव के हासिल हो सके. यह एडवाइजरी मीडिया की इस भूमिका में पत्रकारों के महत्वपूर्ण योगदान का जिक्र करती है और कहती है कि पत्रकारों की सुरक्षा की जिम्मेवारी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की है. यह एडवाइजरी समय-समय पर पत्रकारों और मीडिया पर हो रहे हमलों की बात करती है और कहती है कि ऐसे मामलों की जांच तुरंत होनी चाहिए जिससे अपराधियों पर समयबद्ध तरीके से मुकदमा चलाकर उन्हें दंडित किया जा सके. इस एडवाइजरी में मीडिया से रिश्तों के बारे में इसी मंत्रालय की उस एडवाइजरी का उल्लेख है जो 1 अप्रैल 2010 को जारी की गई थी, साथ ही उसका भी जो 23 मई 2017 की है जिसमें न्याय के शीघ्र वितरण के लिए समयबद्ध जांच के महत्व पर बल दिया गया है.
इन दोनों खबरों को ध्यान से देखने पर ताज्जुब होता है कि जहाँ एक तरफ केंद्रीय सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में पत्रकारों की महत्वपूर्ण भूमिका की बात करती है और उनकी सुरक्षा के लिए एडवाइजरी जारी करती है, वहीं राज्य सरकार उन्हीं पत्रकारों से खुद को इस हद तक असुरक्षित होने का दावा करती है कि उन्हें दो साल जेल भेजने के लिए विधेयक लाती है. ताज्जुब यह भी होता है कि केंद्र सरकार के एडवाइजरी जारी करने के चैथे दिन ही राज्य सरकार पत्रकार एवं मिडिया के अधिकार को सीमित करने के लिए यह विधेयक विधानसभा में पेश करती है. ताज्जुब की बात तो यह भी है कि इन दोनों जगहों पर सरकार भारतीय जनता पार्टी की ही है.
बहरहाल, पत्रकारों पर हमले जारी हैं. इनके साथ गाली-गलौज तथा मार-पीट के साथ-साथ इनकी हत्याओं तक की घटनाएँ थम नहीं रही हैं. 5 सितम्बर 2017 को गोली मार कर गौरी लंकेश की गई हत्या इसी सिलसिले की एक कड़ी है. ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक – 2017’ में दुनिया के 180 देशों में भारत का स्थान 136 वाँ है. ‘इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट्स’ की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक पत्रकारों एवं मीडिया के लिए दुनिया के 26 सबसे खतरनाक देशों की सूची में भारत 7 वें स्थान पर है. केंद्रीय गृह राज्य-मंत्री हंसराज अहिर ने लोकसभा में 26 जुलाई 2016 को बताया था कि उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2014 में पत्रकारों पर के हमले की 114 घटनाएँ हुई थीं और पत्रकारों को गहरी चोट पहुंचाने के लिए 32 लोगों को गिरफ्तार किया गया था.
अकसर यह पाया गया है कि रेत खनन, पत्थर उत्खनन, अवैध निर्माण, चिकित्सा सुविधा में कमी या लापरवाही इत्यादि विषयों या नागरिक प्रशासन और चुनाव संबंधी मुद्दों पर पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को तरह-तरह की धमकियाँ, जिनमें रेप और जान से मार देना तक शामिल है, मिलती हैं. ‘मैप्स ऑफ इंडिया’ की साइट पर ‘शूटिंग द मैसेंजर -अटैक्स ऑन जर्नल्स्ट्सि इन रिसेंट पास्ट’ शीर्षक कथ्य में लिखा है कि मारे जाने वाले पत्रकारों में 41 प्रतिशत राजनीतिक तथा 29 प्रतिशत भ्रष्टाचार संबंधित विषयों पर पत्रकारिता करते थे. इसका तात्पर्य यह कि 70 प्रतिशत पत्रकारों की हत्या राजनीति एवं भ्रष्टाचार संबंधी मुद्दों के कारण हुई. यह कानून एवं व्यवस्था का अच्छा चेहरा नहीं प्रस्तुत करता है. जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया में काफी समय लगना असामाजिक तत्वों के मन में यह अवधारणा पैदा करती है कि वे सर्वोपरि हैं.
उधर पत्रकारों पर हमलों या उनकी हत्या के बारे में दर्ज एफआइआर पर की गई कार्यवाही भी कुछ यों लगती कि किसी रस्मो-रिवाज के तहत फर्जअदायगी की जा रही हो. वहाँ अनुपालन एक सा ही पैटर्न देखने को मिलता है – अज्ञात व्यक्ति/ व्यक्तियों के खिलाफ एफआइआर, अपराध का मकसद ज्ञात नहीं, पुलिस को परिवार-विवाद का संदेह इत्यादि इत्यादि. याने वह सब कुछ जिसका घायल हुए या मारे गए पत्रकार के पेशे से कोई संबंथ न हो.
इन तमाम के मद्देनजर पत्रकार या मीडिया की स्थिति भयावह है. प्रजातंत्र का महत्वपूर्ण चैथा खंभा होने के बावजूद, और बावजूद इसके कि वह देश को प्रभावित करने वाली घटनाओं से लोगों को वाकिफ कराता है तथा यह भी सुनिश्चित करता है कि संविधान के तहत अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार हरेक को बिना किसी दबाव एवं डर के प्राप्त हो, उसकी खुद की स्थिति यह है कि पता नहीं अगले क्षण वो हो या न हो. उस पर कभी भी और कहीं भी हमला हो सकता है, उसको कभी भी और कहीं भी मार दिया जा सकता है.
ऐसे में यह जरूरी है कि राज्य एवं केंद्र शासित प्रदेश पत्रकारों की सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेवारियों के प्रति तनिक और सजग हों. साथ ही यह भी जरूरी है कि ये केंद्रीय गृह मंत्रालय की एडवाइजरीज का पालन करते हुए पत्रकारों पर हमलों या उनकी हत्याओं के मामलों में त्वरित कार्यवाही करते हुए अपराधियों की शिनाख्त कर उन्हें उचित दंड दिलवाएँ. केंद्रीय गृह मंत्रालय की 25 मई 2017 की एडवाइजरी भी कहती है कि – न्याय में विलंब न्याय से वंचित करता है.

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