डॉ. कफील के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं मिला


-नित्यानंद गायेन द्वारा सम्पादित, नयी दिल्ली,
गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में बच्चों की जान बचाने वालें डॉ. कफील अहमद खान को बदनाम करने की कोशिश नाकाम हो गई है। बीआरडी मेडिकल में जब मासूमों की जान खतरें में आई तो डॉ कफील ही वो शख्स थे जिन्होंने ऑक्सीजन सिलेंडर के इंतजाम कर कई बच्चों की जान बचाई थी। आखिर में उन्हें ही 9 बच्चों की मौत का आरोपी बना दिया गया था। उन्हें गिरफ्तार किया गया था। इस मामले की जाँच के लिए योगी सरकार द्वारा गठित एसटीएफ को डॉ.कफील के खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं मिला नहीं मिला है और एसटीएफ ने उन्हें उन पर लगे भ्रष्टाचार और प्राइवेट प्रैक्टिस के दो संगीन आरोप वापस ले लिए हैं।हालांकि वे अब भी दो अन्य गैर-जमानती धाराओं के तहत हिरासत में ही हैं। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, कफील खान के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला है। इससे पहले पुलिस ने मेडिकल कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल डॉक्टर राजीव मिश्रा और कफील खान के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी।
गोरखपुर के एसएसपी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज ने कहा कि डॉक्टर खान के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट और इंफार्मेशन एंड टेक्नॉलॉजी एक्ट के तहत चार्जशीट नहीं दायर की गई है। गोरखपुर हादसे पर जिला अधिकारी की जांच रिपोर्ट में डा कफील को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया था। डीएम की जांच रिपोर्ट में बालरोग विभाग के प्रमुख डॉक्टर कफील खान को क्लीनचिट दी गई थी। डीएम की जांच रिपोर्ट में इस मामले की उच्च स्तरीय जांच की सिफारिश की गई थी।
अब उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स ने डॉ. कफील अहमद खान के खिलाफ लगाए प्राइवेट प्रैक्टिस और भ्रष्टाचार के आरोप हटा लिए हैं। अगस्त में गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज में हुई बच्चों की मौत के बाद उसके चिकित्सक डॉ. कफील समेत कई को इस हादसे का जिम्मेदार ठहराया गया था। राज्य सरकार के कहने पर यूपी एसटीएफ ने मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. राजीव मिश्र और डॉ. कफील के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया था।
इनके अलावा गोरखपुर पुलिस ने डॉ. पूर्णिमा, डॉ. सतीश कुमार, गजानन जायसवाल, लेखा विभाग के लिपिकों सुधीर पांडे, उदय शर्मा और संजय त्रिपाठी तथा पुष्पा सेल्स के मालिक मनीष भंडारी के खिलाफ भी आरोप पत्र दायर किया था।
अब जब मामलें की जांच हुई तो जाँच कर रहे अधिकारी अभिषेक सिंह ने कहा कि, उन्हें ऐसा कोई सुबूत मिलता नहीं जिससे उनपर लगाये गए इल्जाम को सही ठहरा जा सके इसलिए उनके खिलाफ कोई मामला बनता ही नहीं है।
ऐसे में सवाल यह बनता है कि जिन लोगों ने जांच से पहले एक डॉक्टर को बदनाम किया क्या उन पर कोई कार्यवाही होगी ? क्यों हमारे देश में मीडिया किसी को बदनाम करने के लिए इस कदर बेचैन रहती है?

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