दिल्ली के निर्वाचित सरकार के कामकाज में उपराज्यपाल बाधक नहीं बन सकते: सुप्रीम कोर्ट

-नित्यांनद गायेन द्वारा सम्पादित, नयी दिल्ली,
बुधवार,8 नवम्बर को दिल्ली सरकार बनाम उपराज्यराल मामले में सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के रोजाना के कामकाज में बाधा नहीं डाल सकते हैं। सरकार और उपराज्यपाल के बीच मतभेद पॉलिसी मैटर में ही हो सकते हैं। मगर ये मतभेद सिर्फ मतभेद के लिए नहीं हो सकते हैं। उपराज्यापाल के पास निहित दखल देने की जिम्मेदारी भी अपने आप में संपूर्ण नहीं है। वो हर फैसले में ना नहीं कर सकते। वो सिर्फ इसे राष्ट्रपति के पास उनकी राय के लिए भेज सकते हैं। उन्होने कहा कि उपराज्यपाल के प्रशासनिक कार्य संविधान के दायरे में होने चाहिए।
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ आप सरकार की अपीलों पर सुनवाई के दौरान कहा कि मुख्यमंत्री और उनके मंत्रिपरिषद की सहायता और परामर्श शब्द शून्य में नहीं हैं और उन्हें कुछ मायने तो देना ही होगा। मुख्य न्यायाधीश ने उदाहरण देते हुए कहा कि मान लिजिए दिल्ली सरकार 2000 रैन बसेरों के निर्माण का नीतिगत फैसला लेती है। इस फैसले पर वह एलजी से मंजूरी लेगी। इस पर एलजी कह सकते है कि फिलहाल आप सिर्फ 500 रैन बसेरे बनाईए और इसी बीच वो फाईल मंजूरी के लिए राष्ट्रपति को भेज रहें है, और राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती है तो ठीक है। नहीं तो एलजी कह सकते है कि आप सिर्फ 500 रैन बसेरों का ही निर्माण कराइए।
संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एके सीकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं।
बहस के दौरान दिल्ली सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल सुब्रमणियम ने कहा कि उपराज्यपाल ’ब्रिटिश राज के वायसराय’ जैसे नहीं हैं परंतु वह सिर्फ राष्ट्रपति के उस समय तक प्रतिनिधि हैं जब तक उन्हें देश के इस सर्वोच्च पद का विश्वास हासिल है। पीठ ने कहा कि उपराज्यपाल और सरकार के बीच मतभेद नीतिगत मामलों को लेकर हो सकता है और इन मतभेद ठोस कारणों के जरिये साबित किये जाने चाहिए न कि सिर्फ मतभेद के लिये। पीठ ने कहा कि उपराज्यपाल की जिम्मेदारी पूर्णतया नहीं है और यदि आप किसी नीतिगत मामले में श्नश् कहना चाहते हैं तो कृपया इसे राष्ट्रपति के पास भेज दीजिये। कार्यकारी सरकार के रोजमर्रा के कामों में बाधा नहीं डाली जा सकती है।शीर्ष अदालत ने कहा कि ये उसकी अस्थाई टिप्पणियां हैं जो बहस के दायरे में हैं जिस पर केन्द्र अपनी बहस में जवाब दे सकता है। संविधान पीठ ने कहा कि पहली बात तो यह कि उपराज्यपाल और सरकार के बीच नीतिगत मामलों को लेकर किसी प्रकार के मतभेद होनी ही नहीं चाहिए और यदि कोई मतभेद है तो इसका संवैधानिक समाधान खोजना होगा। मंत्रिपरिषद की सहायता और परामर्श के शब्द शून्य में नहीं है और इन्हें कुछ मायने देने की जरूरत है। सुब्रमणियम ने कहा कि यदि मंत्रिपरिषद की सलाह उपराज्यपाल पर बाध्यकारी नहीं है तो यह अनुच्छेद 239एए की भावना का उल्लंघन है।
गोपाल सुब्रह्मण्यम ने कहा कि वैल्यू ऑफ कैबिनेट के एग्जीक्यूटिव पावर को समझना होगा। अदालत को इसकी मान्यता देनी होगी। दिल्ली में चुनी हुई सरकार है और वैल्यू ऑफ एगज़िक्युटिव पावर को समझना होगा। कोर्ट को इसी आलोक में देखना होगा। जो भी केन्द्र शासित प्रदेश है, उसे उपराज्यपाल के जरिये राष्ट्रपति अपना शासन चलाता है। लेकिन दिल्ली का स्पेशल करैक्टर है और यहां विधान सभा बनाया गया है। चुनी हुई सरकार है और यहां मामला स्पेशल करैक्टर का है और उप बंध लगाया गया है ताकि एक कंट्रोल रह सके।

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