छत्तीसगढ़ में आदिवासी महिलाओं पर पुलिसिया कहर

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हिमांशु कुमार की रिपोर्ट
29जनवरी को छत्तीसगढ़ के दन्तेवाड़ा जिले के गमपुर गांव की चैदह साल की बच्ची के साथ पुलिस के जवानों ने बलात्कार किया,जब उसके रिश्तेदार युवक ने विरोध किया तो पुलिस के जवानों ने उस लड़की और विरोध करने वाले युवक को गोली से उड़ा दिया ।
पुलिस ने मीडिया को बताया कि हमारे जवानों ने अतुल्य वीरता का परिचय देते हुए दो नक्सलियों को ढेर कर दिया। ग्रामीणों ने विरोध स्वरूप लाशों का अन्तिम संस्कार नहीं किया ।
मारे गये युवक का भाई सोनी सोरी से मिलने आ रहा था तो पुलिस ने उसे जेल में डाल दिया, ग्रामीणों ने सोनी सोरी को गांव में बुलाया।
12फरवरी को सोनी सोरी गाँव गयी, सोनी सोरी को गांव वालों ने दोनों लाशें दिखाईं,ग्रामीणों ने बताया कि मारे गये दोनों की लाशों की आंखें और किडनी गायब थीं ।
सोनी सोरी ने इस मामले की जाँच की मांग की है। इस पर सरकार ने जाँच करने की बजाय पुलिस दल को गांव में लाशों को नष्ट करने भेजा।
17फरवरी को पुलिस फोर्स ने गांव में जाकर बुजुर्ग आदिवासी महिलाओं की बुरी तरह पिटाई की।
पिटाई के फोटो आप देख सकते हैं,पुलिस वालों का कहना था कि तुम लोग सोनी सोरी से शिकायत क्यों करते हो ? क्या इस तरह का व्यवहार एक लोकतन्त्र में सम्भव है, राष्ट्रवाद की नकली बातें, महिलाओं के सम्मान की फर्जी बातें !
चैदह साल की आदिवासी लड़की के साथ पुलिस वालों द्वारा बलात्कार करने के बाद गोली मारने के मामले में,
जांच की मांग कर रही जिन आदिवासी महिलाओं को पुलिस वालों बुरी तरह पीटा है,
उन महिलाओं ने बताया है कि हमें मारते हुए पुलिस वाले बोल रहे थे कि तुम लोग जाकर मानवाधिकार आयोग को अपनी जांघें दिखा कर पुलिस से पिटाई की बहुत शिकायत करती हो,
इस दफा हम तुम्हें ऐसी जगहा मारेंगे कि तुम अपनी चोट किसी को दिखा भी नहीं सकोगी ।
इसके बाद पुलिस वालों ने महिलाओं के स्तनों और नितम्बों पर निशाना लगा कर डन्डों और बन्दूक के बटों से बुरी तरह मारा,
सोनी सोरी को यह सब बताते हुए घायल आदिवासी महिलाओं के चेहरे पर शर्म नहीं क्रोध था।
महिलाओं ने सोनी से कहा दीदी आपके साथ जो थाने में हुआ उसके बाद आप शर्म से घर पर नहीं बैठीं बल्कि आपने दुनिया को वह सब बताया, उससे बस्तर की आदिवासी महिलाओं में बहुत हिम्मत आयी है, महिलाओं ने कहा हम पर पुलिस के अत्याचार के फोटो सारी दुनिया मे दिखाइये।
अगर दुनिया को शर्म नहीं आयी तो इससे कम से कम बस्तर की हमारी आदिवासी महिलाओं में हिम्मत तो आयेगी।
मुझे यह सब सुनते समय महसूस हो रहा था कि बस्तर में कम्पनियों की सरकार और आदिवासियों के बीच की इस लड़ाई में जीत बस्तर की महिलाओं की ही होगी। आप चाहें तो यह मुझसे लिखवा कर ले लीजिये ।
एक लोकतन्त्र में यह बिल्कुल नाकाबिले बर्दाश्त होना चाहिये।

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