भारत-चीन संबंध: राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी का संबोधन?

स्वागत के लिए मैंआपको धन्यवाद देता हूं, मुझे उच्च शिक्षा के इस प्रतिष्ठित संस्थान में आकर प्रसन्नता हो रही है। पिकिंग विश्वविद्यालय विद्वानों और नेतृत्व के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। 

संस्थान के प्रबंधन और फैकल्टी के सदस्यों से मिलने का अवसर मिला और अब मैं आप यानी चीन के भविष्य के नेताओं से मिल रहा हूं, आपके चेहरे की मुस्कराहट से ऊर्जा और विश्वास झलक रहा है।इस विश्वविद्यालय ने अपने गौरवशाली इतिहासकाल में अन्तर्राष्ट्रीय विद्वानों का स्वागत किया है तथा पडोस और बाहरी संस्थानों के साथ घनिष्ठ संबंध स्थापित किये हैं। भारत और चीन के बीच समृद्ध आकादमिक आदान-प्रदान में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। “एशियाई पुनरोत्थान” विषय पर गुरूदेव कविवर रविंद्रनाथ टैगोर और उनके समकालीन बुद्धिजीवियों के बीच संवाद, इतिहास का मूल्यवान संवाद है। इस विश्वविद्यालय ने भारत और चीन के विद्वान बौद्ध भिक्षुओं के बीच सार्थक संवाद की परंपरा बनाए रखी है और ज्ञान तथा विचार को साझा करके आपसी समझदारी बढ़ायी है। मुझे पिकिंग विश्वविद्यालय के दो सम्मानित समकालीन विद्वानों की याद आती है, ये विद्वान हैं जि जियान लिन तथा जिन के मू, जिन्होंने पिकिंग विश्वविद्यालय में भारतीय अध्ययन विभाग की स्थापना की।

भारत और चीन महान परंपरा के वाहक हैं। यह परंपरा हमारे बौद्धिक और सांस्कृतिक संपर्कों द्वारा पहली सहस्राब्दी से चली आ रही है। कुमार विजय और बोधिधर्म तथा जुवान जेनगैन फाजिआन के रिकार्डों तथा अनुभवों के योगदान के बिना हम अपने साझा इतिहास की कल्पना नहीं कर सकते। निश्चित रूप से किसी एक काल खंड के बारे में हमारे पास ज्यादा सूचना नहीं है, शायद इस काल में हमारे बीच कम संपर्क हुए। लेकिन यह संतोष की बात है कि विद्वानों की असाधारण परंपरा के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए हम जन- जन के संबंध को फिर से जोड़ते रहे हैं।

पिछली शताब्दी के आरम्भिक वर्षों में जब भारत और चीन विदेशी प्रभुत्व से मुक्त होने के लिए संघर्ष कर रहे थे तब हम दोनों देशों ने एक दूसरे से शक्ति और प्रेरणा प्राप्त की थी। भारतीय लोग हमारी स्वतंत्रता संग्राम में चीन के नेताओं दिए गए समर्थन को याद करते हैं। इसी तरह चीन के लोग चीन के समर्थन में 1925 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रस्ताव को याद करते हैं। उस समय ब्रिटिश-भारतीय सैनिकों को चीन में साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष को दबाने के लिए तैनात किया गया था। 1938 में ड़ॉ कोटनिस के नेतृत्व में मेडिकल मिशन हमारी मित्रता का एक और उदाहरण है। कठिन परिस्थितियों में उनके योगदान को भारत और चीन में आज भी याद किया जाता है।

हमारी दो गौरवशाली सभ्यताओं को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्र भारत ने चीन से मित्रता का संकल्प व्यक्त किया था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में पं. जवाहरलाल नेहरू ने 28 दिसंबर, 1945 को शांति निकेतन में चीन-भारत सांस्कृतिक सोसायटी को संबोधित करते हुए भारत और चीन की मित्रता के दर्शन की व्याख्या की थी। पं. नेहरू ने कहा था, “एक मजबूत और संयुक्त चीन तथा संयुक्त भारत को एक-दूसरे के निकट आना होगा। उनकी मित्रता से न केवल पारस्परिक लाभ होगा बल्कि पूरे विश्व को भी लाभ मिलेगा।”

पिछले सात दशकों में हमारे द्विपक्षीय संबंध कठिनाईयों और चुनौतियों पर खरे उतरे हैं, लेकिन चीन की जनता के साथ मित्रता को सुरक्षित रखने का भारतीय जनता का संकल्प स्पष्ट रूप से दिखा। भारत ने दिसंबर 1949 में चीन जनवादी गणराज्य को मान्यता दी, अप्रैल 1950 में हमारे राजनयिक संबंध स्थापित हुए और 60 और 70 के दशक में भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन जनवादी गणराज्य के प्रवेश और सुरक्षा परिषद में चीन की स्थायी सदस्यता को समर्थन दिया। इस अवधि में हमारे संबंधों का विस्तार हुआ है। प्ररेणा के मूल में हमारी साझी सभ्यता और हमारी साझी एशियाई पहचान रही है। आज भारत और चीन अपने-अपने विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में हैं और दोनों देश मित्रता चाहते हैं। दोनों देश एशियाई शताब्दी के साझा स्वप्न को पूरा करना चाहते हैं। इस दृष्टिकोण से हमारे दोनों देशों को राजनीतिक और आर्थिक लाभ प्राप्त हुए हैं।

आज आपको संबोधित करते हुए मैं भारत और चीन के उन दूरदर्शी लोगों के प्रति आभार व्यक्त करता हूं जिन्होंने हमारी जनता के बीच समझदारी बढ़ाने तथा दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच घनिष्ठ शैक्षिक संबंध बढ़ाने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली।

आज वैश्विक आर्थिक अनिश्चता के समय हमारे दोनों देशों के विश्व की 40 फीसद आबादी के दबाव के बावजूद एकता और विकास को बनाए रखा है। विश्व अर्थ व्यवस्था तथा क्षेत्रीय और वैश्विक स्थिरता में हमारे संयुक्त योगदान को नकारा नहीं जा सकता। भारत और चीन विश्व शक्ति में शामिल होने के लिए तैयार हैं।

उभरती अर्थव्यवस्था के रूप में यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम क्षेत्रीय और वैश्विक समृद्धि पर समान रूप से ध्यान केंद्रित करें। हमें एशियाई शताब्दी बनाने का अवसर मिला है। यह कार्य आसान नहीं होगा। हमें बाधाओं और मुश्किलों को दूर करना होगा। हमें साझे रूप में यह सपना पूरा करना होगा। हम एकसाथ ऐसा कर सकते हैं। अगर हम टिकाऊ मित्रता करें तो ऐसा कर सकते हैं। हम ऐसा किस तरह कर सकते हैं, इस पर मैं प्रकाश डालना चाहूंगा।

मैं यह बल देकर कहना चाहूंगा कि घनिष्ठ विकास साझेदारी के लिए दोनों देशों के बीच राजनीतिक समझदारी महत्वपूर्ण है। ऐसा राजनैतिक संवाद बढ़ाकर किया जा सकता है। भारत में हमारा संकल्प चीन के साथ साझेदारी को मजबूत बढ़ाने का है। दोनों देशों के नेताओं के बीच समय-समय पर संपर्क इस बात का साक्ष्य है। हमने समान आधार को व्यापक बनाया है और अपने मतभेदों का प्रबंधन करना सीखा है। कुछ चुनौतियां हैं जिनका व्यापक समाधान करने की आवश्यकता है। इनमें सीमा का प्रश्न भी है। यह स्वाभाविक है कि पड़ोसियों के बीच कुछ मुद्दों पर समय-समय पर मतभेद होते हैं। मैं इसे दोनों पक्षों की राजनैतिक समझ की परीक्षा समझता हूं। परीक्षा की इस घड़ी में हमसे सभ्यतामूलक समझदारी और दोनों पक्षों की संतुष्टि योग्य इन मतभेदों को दूर करने की अपेक्षा की जाती है। दोनों पक्षों को यह सुनिश्चित करने के उद्देश्य से काम करना चाहिए कि हम आने वाली पीढ़ी पर अनसुलझी समस्याओं और अनसुलझे मतभेदों का बोझ ना डालें। मुझे विश्वास है कि यह सुनिश्चत करके इन मामलों को बढ़ाया नहीं जाएगा औऱ पारस्परिक चिंताओं के बीच संवेदी बनकर हम अपने मतभेद कम कर सकते हैं और अधिक सहयोग कर सकते हैं।

मुझे खुशी है कि हम समान हित के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी साझेदारी बढ़ा रहे हैं। चीन हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। विकास के हमारे अनुभव एक-दूसरे के लिए प्रासंगिक हैं। बुनियादी संरचना, मोबिलिटी, उर्जा, कौशल विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा और शहरीकरण में हमारी उपलब्धियां आदान- प्रदान और सहयोग के लिए उर्वर भूमि हैं। हमारी रक्षा और सुरक्षा आदान-प्रदान कार्यक्रम में वार्षिक सैन्य अभ्यास भी शामिल है। भारत में चीन का और चीन में भारत का निवेश हो रहा है। सरकार से सरकार स्तर तक चीन के राष्ट्रीय सुधार और विकास आयोग और भारत के नीति आयोग के बीच संवाद हुआ है। हमारी दोनों सरकारें इस प्रक्रिया तथा संबंधों का टिकाऊ ढ़ांचा बनाने के लिए संकल्पबद्ध हैं। 21वीं शताब्दी में महत्वपूर्ण और सार्थक भूमिका अदा करने के लिए भारत और चीन को अपने द्विपक्षीय साझेदारी बढ़ानी चाहिए। जब भारतीय और चीनी वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए सहयोग के लाभ और साझा हित के लाभ को समझने लगेंगे तो हम पारस्परिक लाभकारी साझेदारी कर सकते हैं। हमारे जनता की उपलब्धियों की कोई सीमा नहीं है। हमारी दोनों पक्षों को जनकेंद्रित साझेदारी बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए तांकि दोनों देशों के बीच व्यापक स्तर पर संपर्क हो सके।

जनमुखी साझेदारी के लिए हमें एक-दूसरे पर विश्वास करना होगा। एक-दूसरे की राजनीतिक और सामाजिक प्रणालियों को बेहतर तरीके से समझना होगा। यह सभी स्तरों पर घनिष्ठ संपर्क से ही हो सकता है। आप जानते हैं भारत ने धर्मनिरपेक्ष संसदीय लोकतंत्र अपनाया है। सहिष्णुता, समावेश और सहमति के सिद्धान्तों पर हमारी भागीदारीमूलक शासन व्यवस्था आधारित है। आतंकी कार्रवाइयों से हमारी शांति भंग करने के प्रयास, हमारे विश्वास को डिगा नहीं पाये हैं। हमारा समाज सहनशील है और स्वतंत्र मीडिया लोकहित की रक्षक है। हमारी न्यायपालिका स्वतंत्र है और हमारा समाज जीवंत है।

1- विश्व आबादी के एक-तिहाई से अधिक होने का बावजूद हमारे दोनों पक्षों की ओर से जन-प्रतिनिधियों का संपर्क बहुत सीमित है। समय की आवश्यकता है कि सरकारी और गैर-सरकारी स्तरों पर हमारी जनता के प्रतिनिधियों के बीच और अधिक नियमित संपर्क हो। यह संपर्क राजधानी से दूर प्रांतीय और स्थानीय निकायों तक होना चाहिए। पिछले वर्ष प्रधानमंत्री मोदी की चीन यात्रा के दौरान भारत- चीन, राज्य/प्रांतीय लीडर्स फोरम की स्थापना की गई थी। अब प्रांत से राज्य स्तर के संपर्क बढ़ रहे हैं और दोनों पक्ष स्थानीय निकायों के बीच सहयोग के लिए कार्य कर रहे हैं।

2- भारत और चीन युवा समाज हैं। हमारे युवाओं की आकांक्षाएं और धारणाएं समान हैं। युवाओं के वार्षिक आदान-प्रदान उपयोगी साबित हुए हैं, लेकिन दोनों पक्षों को युवाओं की क्षमताओं को मिलाने के लिए शैक्षिक अवसरों, युवा महोत्सवों, खेल आदान- प्रदान, युवा पर्यटन तथा सोशल मीडिया संपर्क को शामिल किया जाना चाहिए।

3- डिजीटल युग के नागरिक के रूप में हम विजुअल इमेज की शक्ति को मानते हैं। सार्थक धारणा बनाने के लिए इससे संयुक्त फिल्म निर्माण की व्यवस्था हुई। दोनों देशों में हमारी फिल्मों को नियमित रूप से दिखाना चाहिए और कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

4- हमें अपने बौद्धिक तथा सांस्कृतिक आदान- प्रदान को नई शक्ति देने की जरूरत है। भारत में योग और चीन में ताईची तथा पारंपरिक औषधि हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। वार्षिक भारत-चीन थिंक टैंक फोरम तथा उच्च-स्तरीय मीडिया फोरम अच्छे प्रयास हैं। उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच आदान-प्रदान बढ़ाने, सांस्कृतिक उत्सव आयोजित करने तथा संयुक्त शोध और छात्रवृत्ति कार्यक्रम से यह धारणा दूर करने में मदद मिलेगी कि हम पश्चिम की ओर देखने की जरूरत है और शिक्षा विज्ञान तथा टेक्नोलॉजी में प्रगति के लिए एक-दूसरे की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है।

5- एक दूसर को जोड़ने का एक बहुत बड़ा कारण भ्रमण और पर्यटन है। आने वाले दशक में पूरी दुनिया के पर्यटकों में भारतीय और चीनी होंगे। पर्यटन स्थल के रूप में भारत की अपार संभावना को बेहतर तरीके से पेश किया जाना चाहिए। मैं दोनों सरकारों की पिछले वर्ष चीन में विजिट इंडिया वर्ष आयोजित करने और भारत में इस वर्ष विजिट चीन वर्ष आयोजित करने के लिए प्रशंसा करता हूं। कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए दूसरा मार्ग खोलने के आपकी सरकार के निर्णय का हम स्वागत करते हैं। भारत के लोगों को अब चीन में अपने उपासना स्थलों की यात्रा का अधिक अवसर मिलेगा और चीन के लोग भारत में बौद्ध केंद्रों की यात्रा कर सकेंगे।

6- हमारे समाज में सिविल सोसायटी की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। सिविल सोसायटी, शहरीकरण की चुनौतियों, पर्यावरण क्षरण, कौशल विकास और डिजिटल खाई पाटने में कार्य करती है। सिविल सोसायटी समाधान और अनुभव साझा करके सहयोग कर सकते हैं।

7- वैश्विक और विकास के विषयों पर हमारा दृष्णिकोण समान है। जी-20, ब्रिक्स, ईएएस, एआईआईडी, एससीओ तथा संयुक्त राष्ट्र सहित बहुपक्षीय मंचों पर हमने मजबूती से सहयोग किया है। हम ऐसे मंचों का उपयोग दोनों देशों के भविष्य के बारे में लोगों की जागरूकता बढ़ाने में कर सकते हैं। जब वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर हम दोनों देशों की जनता और हमारी सरकारों को एक-साथ काम करना देखेंगे तो विश्व भी हमारा समर्थन करेगा।

8- हमें एक-दूसरे के पूरक बनने में व्यापार और वाणिज्य सर्वाधिक शक्तिशाली माध्यम बन सकते हैं। हमें इस बात की खुशी है कि पिछले दशक में हमारे द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंध बढ़े हैं लेकिन अभी और संभावनाएं हैं। हम ‘मेक इन इंडिया’ और ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ में भाग लेने के लिए चीन की कंपनियों को आमंत्रित करते हैं। आइए, हम संयुक्त रूप से कारोबार का नया मॉडल बनाएं।

देवियो और सज्जनों मुझे विश्वास है कि हम इन आठ स्तंभों को जनमुखी आधार पर रखेंगे। तभी हम सफलता पूर्वक दोनों देशों की जनता के पारस्परिक लाभ के लिए अपना सहयोग मजबूत कर सकते हैं और बढ़ा सकते हैं।

गांधीजी ने 1942 में कहा था, मैं वह दिन देखना चाहता हूं जब स्वतंत्र भारत और स्वतंत्र चीन अपनी भलाई तथा एशिया और विश्व की भलाई के लिए मित्रता और भाईचारे में एक- दूसरे का सहयोग करेंगे। मैं भारत और चीन की जनता का इस उद्देश्य प्राप्ति के लिए चुनौतियों के बावजूद अथक प्रयास करने का आह्वान करता हूं। मुझे विश्वास है कि स्वर्णिम दृष्टि को हासिल करने के लिए हम एकसाथ काम करेंगे।

महामहिम राष्ट्रपति जी, मेजबानी के लिए मैं एक बार फिर आपको धन्यवाद देता हूं।

धन्यवाद।

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