आॅल इंडिया पीपुल्स फोरम के मंच से एक स्वर में मांगः जस्टिस लोया की मौत की निष्पक्ष जाँच हो


-नित्यानंद गायेन, नई दिल्ली,
जज बृजगोपाल लोया की संदिग्ध मौत को लेकर अंग्रेजी पत्रिका कारवाँ में 21 नवंबर 2017 को आई पत्रकार निरंजन टाकले की सनसनीखेज स्टोरी के बाद देश भर में जो सनसनी फैली थी वह जल्द सन्नाटे में दब गई थी। किन्तु अब यह मुद्दा फिर से सुर्खियाँ बनने लगी है ।
शुक्रवार,12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने सार्वजनिक रूप से प्रेस वार्ता कर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर मामलों को उचित पीठ को आवंटित करने के नियम का पालन नहीं करने का आरोप लगाया। इसमें से एक मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के न्यायाधीश बीएच लोया की रहस्यमय परिस्थिति में हुई मौत से संबंधित याचिका को उचित पीठ को ना सौंपे जाने का मामला शामिल है। सीजीआई के खिलाफ विरोध जताने के लिए न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर के आवास पर चारों वरिष्ठ न्यायधीशों जिनमें न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ और न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर शामिल थे. इन चारों जजों ने मीडिया से कहा कि सुप्रीम कोर्ट में सब कुछ सही नहीं चल रहा है।
जब न्यायाधीशों से विशेष रूप से यह पूछा गया कि क्या वे सीबीआई के विशेष न्यायाधीश बृजगोपाल हरिकृष्ण लोया की मौत की जांच की मांग करने वाले मामले को लेकर नाराज हैं? जवाब में न्यायमूर्ति गोगोई ने “हां” कहा। न्यायाधीश लोया गैंगस्टर सोहराबुद्दीन शेख के उस मामले की सुनवाई कर रहे थे, जो उसे कथित रूप से फर्जी मुठभेड़ में मार गिराए जाने से संबंधित था। इस मामले के आरोपियों में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का भी नाम था। न्यायाधीश लोया का कथित तौर पर हृदय गति रुक जाने से निधन हो गया था। उनके परिजनों ने उनके निधन की परिस्थितियों पर सवाल उठाया था, और मामले की स्वतंत्र जांच कराए जाने की मांग की थी।
सर्वोच्च न्यायालय के इन चार जजों के प्रेस वार्ता के बाद देश में हलचल मच गया। इस अभूतपूर्व घटना की आलोचना भी हुई और बड़े पैमाने पर स्वागत भी। इसके दो दिन बाद यानि 14 जनवरी 2018 को मृत जज के बेटे अनुज लोया ने भी एक प्रेस वार्ता किया और उन्होंने कहा कि उन्हें अपने पिता की आकस्मिक मौत को लेकर पहले संदेह था लेकिन अब उन्हें कोई संदेह नहीं है। अनुज ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि कई लोग इस मामले में परिवार को परेशान कर रहे हैं। हमारे परिवार को वकील एनजीओ परेशान न करें। जब पिता की मौत हुई थी तो भावनात्मक कारणों के चलते हमें इस पर संदेह था लेकिन अब हमें किसी पर शक नहीं इसलिए मामले में जांच की जरुरत नहीं। किन्तु सुप्रीम कोर्ट के चार जजों के प्रेस कान्फ्रेंस के बाद 21 वर्षीय अनुज का इस तरह अचानक प्रेस वार्ता करना बहुत अनोखा था और इस घटना ने अनेक सवाल खड़े कर दिए। इसी अनुज ने कभी कभी पत्र लिख कर अपने पिता की मौत की जाँच की मांग की थी। इधर 15 जनवरी को दिल्ली के इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट में आल इंडिया पीपल्स फोरम द्वारा आयोजित जज लोया की संदिग्ध मौतः ’लोकतंत्र के समक्ष चुनौतियाँ’ नामक परिचर्चा में बी.जी कोलसे पाटिल (पूर्व न्यायाधीश मुंबई उच्च न्यायलय),वरिष्ठ अधिवक्ता और बार असोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष उदय गवारे, पत्रकार निरंजन टाकले, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह, पत्रकार हरतोष सिंह बल और ने एक स्वर में कहा कि जस्टिस लोया की मौत की जाँच होनी चाहिए . खचाखच भरे सभागार में इन सभी ने जस्टिस लोया के पुत्र अनुज की प्रेस वार्ता पर हैरानी जताते हुए कहा कि इसी अनुज ने वर्ष 2014 में अपने पिता की मौत की जाँच के लिए पत्र लिखा था और इस बीच वह लगातर खामोश रहा अब अचानक उसने क्यों और किसके कहने पर यह सब किया ? उदय गवारे ने कहा कि वे जज लोया के सबसे करीबी मित्र रहें और जज लोया बहुत ईमानदार थे और सोराबुद्दीन मामले की सुनवाई करते हुए वह लगातर दबाब में थे पर वह झुकने को तैयार नहीं थे किसी भी दबाब के आगे.
पत्रकार निरंजन टाकले (जिन्होंने इस मामले में सबसे पहले स्टोरी किया था) ने जज लोया की मौत की खबर के बारे में विस्तार से बताया कि कैसे उन्होंने इस मामले की खोजबीन की, कब किनसे मिले और फिर यह रिपोर्ट तैयार हुई . उन्होंने यह भी बताया कि इस खबर को फरवरी 2017 में आनी थी पर नहीं आई फिर कारवां ने इसे नवम्बर में प्रकाशित किया. निरंजन टाकले ने अपनी बात रखते हुए कहा कि उन्होंने कभी भी इस बात की परवाह नहीं की कि इस रिपोर्ट के आने के बाद उनके साथ क्या होगा.
कारवां पत्रिका के पॉलिटिकल एडिटर हरतोष सिंह बल ने कहा इस पूरे मामले में लीपापोती की बहुत कोशिश हुई पर उससे कुछ नहीं बदला और इस मामले की निष्पक्ष जाँच होनी ही चाहिए .
मुंबई उच्च न्यायलय के पूर्व न्यायाधीश बी.जी कोलसे पाटिल ने कहा -लोकतंत्र खतरे में है, देश में गुंडाराज चल रहा है पर हमें डरना नहीं है. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा की गई प्रेस वार्ता को उचित ठहराते हुए कहा कि यदि इसी तरह लोगों को न्याय से वंचित किया गया तो बहुत भयानक हालत होगी . उन्होंने बताया कि नागपुर हाईकोर्ट में बहुत कुछ गड़बड़ है और लगता है कि वो सब अब दिल्ली में भी आ गया है -नागपुर दिल्ली आ गया है . अपने व्यक्तव्य में जस्टिस पाटिल ने कहा कि यहाँ सुप्रीम कोर्ट में भी सब कुछ ठीक नहीं है तभी तो जजों को मीडिया से बात करनी पड़ी . तो जब कोर्ट में जजों की बात नहीं सुनी जा रही है तो आम जन की बात कौन सुनेगा ?
जस्टिस पाटिल ने कहा डर के जीने से अच्छा है लड़कर मर जाना , डर कर जीना मतलब रोज मरना होता है . उन्होंने कहा कि कोई भले ही प्रधानमंत्री बन जाये या पार्टी अध्यक्ष पर देखना यह है कि वे हैं क्या ? क्या इतिहास है उनका . वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने भी अपनी बात रखी . उन्होंने कहा कि इस मामले की जाँच जरुरी हैए इंदिरा जयसिंह की मांग है कि मौत के पूरे मामले से पर्दा हटना चाहिए. इंदिरा जयसिंह की मांग है कि मौत के पूरे मामले से पर्दा हटना चाहिए.उन्होंने जजों द्वारा प्रेस कान्फ्रेंस को जायज बताते हुए कहा कि श्मैं उन लोगों की आलोचना करती हूँ जो इस प्रेस कान्फ्रेंस की आलोचना कर रहे हैं. हमारा यह जानने का हक है कि न्यायिक व्यवस्था में क्या चल रहा है . जब तक सरकार न्यायिक व्यवस्था को कोलाप्स नहीं करना चाहेगी तब तक वह कोपाल्स नहीं होगी . सवाल यह है कि न्याय व्यवस्था की रक्षा कौन करेगा ? और मेरी समझ से केवल वकील और बार असोसिएशन सामने आकर ही इसे बचा सकते हैं. इसलिए जिन जजों ने प्रेस कान्फ्रेंस किया उन्होंने स्वतंत्र न्याय व्यवस्था के पक्ष में किया . मैं उनका अभिनन्दन करती हूँ
अंत में ए आइ पी एफ की तरफ से वरिष्ठ पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता जॉन दयाल ने कहा युवा पीड़ी को सीखनी चाहिए कि निर्भीक पत्रकारिता क्या है । गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले से जुड़े सभी दस्तावेज सीलबंद लिफाफे में जमा करने के लिए महाराष्ट्र सरकार को आदेश दिया था। कार्यक्रम का संचालन कविता कृष्णन ने किया
इस बीच खबर है कि सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई को लेकर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा और चार सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों के बीच एक तरह से मतभेद उभरने के बीच शीर्ष अदालत ने सीजेआई की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के गठन की घोषणा की है इस संविधान पीठ में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले चारों न्यायाधीशों- न्यायमूर्ति जे चेलमेश्वर, न्यायमूर्ति रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति एम बी लोकुर और न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ में से किसी का नाम पांच जजों की संविधान पीठ के सदस्यों में नहीं है.

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